एक बार प्रिंस ऑफ़ वेल्स एडवर्ड अष्टम प्रथम विश्वयुद्ध में घायल कैदियो कों देखने गए| एक निजी अस्पताल में उनका इलाज हो रहा था| वहा तैनात सैनिक अधिकारी और अस्पताल के अधिकारियो ने घायल सैनिको से उनकी भेंट करवाई| अधिकारियो ने जब कार्यक्रम पूरा होने की बात कही, तब प्रिंस ने कहा - "आपने तो कहा था की 36 सैनिक घायल है मगर यहाँ तो 29 ही दिखाए दिए| बाकि सैनिक कहा हैं?"
अधिकारियो ने कहा - "सर अन्य सैनिक इसी अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन उनकी हालत नाजुक हैं| उनके शरीर पर जगह जगह चोटे आई हुई हैं| आप उन्हें देखे वे ऐसी स्थिति में नहीं हैं|"
अधिकारियो की बात सुनकर प्रिंस बोले - "जिन सैनिको ने देश के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया, क्या मै उनसे सिर्फ इसीलिए नहीं मिलू की वे बुरी तरह घायल हैं?" उनसे तो मुझे सबसे पहले मुलाकात करनी चाहिए थी|
अधिकारियो के पास कोई दूसरा विकल्प ना था| उन्हें प्रिंस कों घायलों से मिलाने ले जाना पड़ा| प्रिंस ने सबसे बातचीत कर उनका दुःख बांटने की कोशिश की| उस विभाग का दौरा खत्म हुआ तो, अधिकारी उन्हें अस्पताल से बाहर ले आए| प्रिंस अपनी गाड़ी में बैठने ही वाले थे की अचानक उन्होंने पुछा - "यह तो 6 ही सैनिक हुए सांतवा कहा हैं?"
एक वरिष्ठ अधिकारी बोला - "सर उस सैनिक की हालत बहुत ख़राब हैं| उसका पूरा चेहरा ख़राब हैं, सीना फट गया हैं, आप उसे देख न सकेंगे|"
मैं उसे मिले बगैर यहाँ से नहीं जाऊंगा| प्रिंस ने गाड़ी से उतरते हुए कहा|
अधिकारियो ने बहुत कहा की वह सैनिक ऐसी हालत में हैं की वह ना तो कुछ सुन सकता हैं, ना देख सकता हैं और ना ही कुछ बोल सकता हैं| प्रिंस फिर भी उससे मिलने गए| उन्होंने उसके हाथ पर हाथ रखा| जो बात वो मुंह से कहते उसे उन्होंने अपने स्पर्श से कहा| वीरो के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाते हुए उन्होंने उसके ज़ख्मी हाथ कों चूमा और गीली आँखे लिए हुए बाहर आ गए|
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