सोमवार, जून 15

जब तक दीपक जलता है

जब तक दीपक जलता है

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक युवक रहता था। उसका परिवार बेहद साधारण था। पिता लकड़ियाँ काटकर घर चलाते थे और माँ गाँव के लोगों के कपड़े सिलती थीं। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए रात को मिट्टी के दीपक की रोशनी में ही काम होता था। मोहन बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था। वह अक्सर गाँव के बाहर पहाड़ी पर बैठकर दूर शहर की चमकती रोशनियों को देखा करता था। उसे लगता था कि उन रोशनियों के पीछे कोई ऐसी दुनिया है जहाँ सपने सच होते हैं। लेकिन गाँव के लोग उसकी बातों पर हँसते थे। वे कहते, "मोहन, बड़े सपने देखने से कुछ नहीं होता। गरीब आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए।" मोहन उनकी बातें सुनता जरूर था, लेकिन अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने देता था।

एक छोटी-सी सीख

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उन्होंने लोगों को जीवन के बारे में कई बातें बताईं। जब सभा समाप्त हुई तो मोहन उनके पास गया और बोला, "महाराज, मैं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास न साधन हैं और न ही अवसर। मैं क्या करूँ?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "बेटा, रात का अंधेरा कभी सूरज को रोक नहीं सकता। लेकिन सूरज बनने के लिए पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

मोहन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन उसने इसे अपने दिल में बसा लिया।

संघर्ष का दौर

कुछ वर्षों बाद पिता की तबीयत खराब हो गई। घर की जिम्मेदारी मोहन के कंधों पर आ गई। अब उसे दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी पड़ती थीं। शाम को थका हुआ शरीर जवाब दे देता, लेकिन वह फिर भी किताबें लेकर बैठ जाता। कई बार उसकी आँखें नींद से बंद होने लगतीं, फिर भी वह खुद को जगाकर पढ़ाई करता। उसे विश्वास था कि मेहनत का फल एक दिन जरूर मिलेगा। गाँव के कई लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन मोहन ने हार नहीं मानी।

पहली असफलता

एक दिन उसे शहर जाकर एक बड़ी छात्रवृत्ति परीक्षा देने का मौका मिला। उसने महीनों तैयारी की थी। परीक्षा हुई और वह पूरे विश्वास के साथ घर लौटा। लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था। मोहन टूट गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई हो। कई दिनों तक उसने किताबों को हाथ तक नहीं लगाया। उसे लगने लगा कि शायद गाँव वालों की बात सही थी। शायद बड़े सपने सिर्फ अमीर लोगों के लिए होते हैं।

दीपक की याद

एक रात वह उदास होकर घर के बाहर बैठा था। सामने रखा दीपक तेज हवा में भी जल रहा था।

उसे अचानक साधु की बात याद आई - "सूरज बनने से पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

उसने महसूस किया कि एक असफलता उसकी मंजिल नहीं छीन सकती। उस रात उसने फैसला किया कि वह दोबारा प्रयास करेगा।

नया सफर

मोहन अगले दिन शहर चला गया। उसने एक पुस्तकालय में सहायक का काम शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन वहाँ उसे हजारों किताबों तक पहुँच मिल गई। दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। उसने अपने हर खाली मिनट का उपयोग सीखने में किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब वह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए पढ़ रहा था।

बड़ा अवसर

एक वर्ष बाद राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें पूरे प्रदेश के हजारों छात्र भाग लेने वाले थे। मोहन ने भी आवेदन कर दिया। प्रतियोगिता कठिन थी। कई प्रतिभागी बड़े शहरों और प्रतिष्ठित स्कूलों से आए थे।

पहले दिन ही मोहन घबरा गया।

उसे लगा कि वह इन लोगों के सामने टिक नहीं पाएगा।

लेकिन तभी उसने खुद से कहा, "अगर मैं अपनी तुलना दूसरों से करूँगा तो हमेशा कमजोर महसूस करूँगा। मुझे सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।"

यही सोचकर उसने पूरी मेहनत से प्रतियोगिता में भाग लिया।

सफलता का क्षण

कुछ हफ्तों बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र का नाम था - मोहन

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक छोटे गाँव का लड़का इतनी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। जब यह खबर गाँव पहुँची तो वही लोग, जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। लेकिन मोहन के चेहरे पर घमंड नहीं था। उसे पता था कि यह सफलता सिर्फ एक पड़ाव है।

गाँव के लिए कुछ करने का संकल्प

सफलता मिलने के बाद मोहन ने शहर में ही बसने का निर्णय नहीं लिया। वह अपने गाँव वापस लौटा। उसने देखा कि गाँव के बच्चे आज भी वही कठिनाइयाँ झेल रहे हैं जो उसने झेली थीं। इसलिए उसने गाँव में एक छोटा-सा पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शुरू किया।

शुरुआत में केवल कुछ बच्चे आए। लेकिन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के विद्यार्थी वहाँ पढ़ने आने लगे। मोहन उन्हें सिर्फ किताबें नहीं देता था, बल्कि आत्मविश्वास भी देता था।

जब दीपक सूरज बन गया

कई वर्षों बाद वही गाँव शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

जहाँ पहले लोग बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते थे, अब उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

एक दिन एक छात्र ने मोहन से पूछा, "सर, आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी अंधेरे को कोसा नहीं। मैंने बस अपना दीपक जलाए रखा।"

शिक्षा

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य पर विश्वास रखते हैं और लगातार प्रयास करते रहते हैं, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमती है। असफलता रास्ता रोकने नहीं, बल्कि आपको और मजबूत बनाने के लिए आती है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपना दीपक जलाए रखता है, वही एक दिन सूरज बनकर चमकता है।

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

बुधवार, जून 10

भक्त और भगवान का संबंध

relationship-between-devotee-and-god

एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे। वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 

एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे।

संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले। - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया

भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ, सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडू साथ,

मंगलवार, जून 9

अंधेरे से उजाले तक

from-darkness-to-light

गाँव रामपुर के एक गरीब किसान का बेटा अर्जुन, अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। उसके पास न पैसे थे, न संसाधन, लेकिन उसकी आँखों में एक सपना था, देश का सबसे बड़ा आईपीएस अफसर बनने का।

अर्जुन बचपन से ही होशियार था। दिन में खेतों में पिता का हाथ बँटाता और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता। उसके दोस्त अक्सर कहते, “अर्जुन, तू क्यों अपना सिर फोड़ रहा है? तेरे जैसे गरीब लड़के अफसर नहीं बनते।” लेकिन अर्जुन बस मुस्कुरा कर कहता, “मेरे सपनों की उड़ान, मेरी ज़मीन से नहीं, मेरे हौसले से तय होती है।”

संघर्ष की शुरुआत

एक दिन गाँव में सरकारी अधिकारी आए और किसानों की ज़मीन गलत दस्तावेज़ों के नाम पर ज़ब्त करने लगे। अर्जुन के पिता की ज़मीन भी खतरे में पड़ गई। अर्जुन ने विरोध किया, लेकिन पुलिस वालों ने उसे ग़लत तरीके से पकड़ कर जेल में डाल दिया।

जेल की सलाखों के पीछे अर्जुन ने फैसला किया - अब वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस गरीब के लिए लड़ेगा जिसे सिस्टम ने कुचला है।

एक नई शुरुआत

जेल से छूटने के बाद अर्जुन शहर चला गया। वहाँ वह एक चाय की दुकान पर काम करने लगा, ताकि अपने रहने और पढ़ाई का खर्च निकाल सके। दिनभर काम, रातभर पढ़ाई। कई बार भूखा सो गया, कई बार किताबों पर ही नींद आ गई। लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा।

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद वह UPSC परीक्षा में बैठा। जब रिजल्ट आया, अर्जुन AIR 7 पर था। पूरे गाँव ने पटाखे जलाए, लेकिन अर्जुन के चेहरे पर एक सन्नाटा था—क्योंकि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। वे बेटे की सफलता नहीं देख पाए।

आईपीएस अर्जुन राठौर की वापसी

अर्जुन की पहली पोस्टिंग उसी जिले में हुई जहाँ उसकी ज़मीन छीनी गई थी। अब वह एक अफसर था—आईपीएस अर्जुन राठौर। पहली ही मीटिंग में उसने उस भ्रष्ट अधिकारी को निलंबित किया जिसने उसके पिता को अपमानित किया था।

लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी।

ड्रामा और थ्रिल

रामपुर और उसके आसपास के इलाकों में एक बड़ा भू-माफिया सक्रिय था—नाम था विक्रम ठाकुर। वह राजनीतिक लोगों से मिला हुआ था, और पुलिस भी उससे डरती थी। अर्जुन ने जब अवैध कब्जे की फाइलें खोलीं, तो धमकियाँ आने लगीं।

एक रात अर्जुन की गाड़ी पर हमला हुआ। गोलियाँ चलीं, लेकिन वह बाल-बाल बचा। उसके साथी अफसरों ने कहा, “सर, ठाकुर से भिड़ना आसान नहीं है।” अर्जुन ने दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं भी रामपुर का बेटा हूँ। डरता नहीं, लड़ता हूँ।”

आखिरी मुठभेड़

अर्जुन ने एक रणनीति बनाई। उसने ठाकुर के आदमी को गिरफ्तार कर गुप्त जानकारी हासिल की। एक रात, पुलिस टीम के साथ अर्जुन ठाकुर के गोदाम पर छापा मारने पहुँचा। वहाँ भारी गोलीबारी हुई। धुएँ और अंधेरे के बीच अर्जुन ने खुद ठाकुर का पीछा किया। छत पर आमना-सामना हुआ।

ठाकुर बोला, “तू मुझे नहीं पकड़ सकता, मैं सिस्टम हूँ।”    

अर्जुन ने कहा, “सिस्टम अब बदल रहा है।”

एक जोरदार भिड़ंत के बाद, अर्जुन ने ठाकुर को गिरा दिया और हथकड़ी पहनाकर नीचे लाया।

अंत - उजाले की जीत

ठाकुर की गिरफ्तारी ने पूरे जिले में हलचल मचा दी। लोगों को पहली बार यकीन हुआ कि ईमानदारी और साहस से सिस्टम को बदला जा सकता है। अर्जुन ने न सिर्फ अपने पिता की ज़मीन वापस ली, बल्कि गाँव के हर किसान को न्याय दिलाया।

अर्जुन अब सिर्फ एक अफसर नहीं था - वह एक प्रेरणा बन चुका था।

सीख: जिंदगी में चाहे जितनी मुश्किलें आएं, अगर हौसला बुलंद हो और मकसद साफ हो, तो कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती। अंधेरे में डटे रहो, उजाला खुद रास्ता बना लेगा।

शनिवार, सितंबर 13

संघर्ष से सफलता तक

संघर्ष से सफलता तक

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में अजय नाम का लड़का रहता था। बचपन से ही उसके दिल में बड़े सपने थे। वह साधारण परिवार से था, लेकिन उसका सोच असाधारण थी। अजय हमेशा कहता,
“अगर हौसला बुलंद हो, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।”

चुनौती का निमंत्रण

एक दिन गाँव के पास पहाड़ों में रहने वाले साधुओं ने घोषणा की कि जो भी युवक उस कठिन पर्वत शिखर तक पहुँच जाएगा, उसे “वीर सम्मान” और अपने जीवन के लिए प्रेरणा का खजाना मिलेगा। यह पर्वत अब तक किसी ने नहीं चढ़ा था क्योंकि रास्ता खतरनाक और अज्ञात था। गाँव के कई लड़के पीछे हट गए। लेकिन अजय ने ठान लिया कि वह इस चुनौती को स्वीकार करेगा। उसके माता-पिता डर गए और बोले,

“बेटा, ये काम बहुत खतरनाक है।” अजय ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“माँ-पिता जी, खतरे से भागने वाले इतिहास नहीं बनाते। साहस करने वाले ही नया रास्ता दिखाते हैं।

सफ़र की शुरुआत

अजय ने केवल कुछ जरूरी सामान लिया – एक रस्सी, थोड़े अनाज, और पानी। सुबह सूरज निकलते ही उसने सफ़र शुरू किया।

रास्ते में घना जंगल आया। वहाँ अजय ने कई wild जानवरों की आवाज़ें सुनीं। अचानक एक बड़ा साँप उसके रास्ते में आ गया। अजय ने हिम्मत नहीं हारी। उसने पास पड़ी लंबी टहनी उठाई और साँप को धीरे-धीरे हटाकर आगे बढ़ा।

उसने खुद से कहा, “डर वही जीतता है, जिसे हम जीतने देते हैं। अगर मन मजबूत है तो हर समस्या का हल निकलता है।”

संघर्ष की रात

रात का समय था। अजय ने एक चट्टान के नीचे आराम करने की कोशिश की। लेकिन ठंडी हवाएँ और भूख ने उसे चैन से सोने नहीं दिया। पेट में दर्द हो रहा था, फिर भी उसने हार नहीं मानी। उसने तारों को देखते हुए सोचा,
“ये तारे मुझे याद दिलाते हैं कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, रोशनी की किरणें हमेशा मौजूद रहती हैं। मुझे भी आगे बढ़ना है।”

वह आधी रात तक जागता रहा, लेकिन सुबह होते ही नई ऊर्जा के साथ आगे निकल पड़ा।

दोस्त की मदद

जंगल पार करने के बाद अजय को नदी मिली। पानी का बहाव तेज था। वह सोच ही रहा था कि कैसे पार करे, तभी उसे पास में एक घायल हिरण दिखाई दिया। अजय ने सोचा – अगर मैं इस बेचारे की मदद नहीं करूंगा, तो मेरा साहस अधूरा रहेगा।

उसने बड़ी मेहनत से हिरण का घाव साफ़ किया और पत्तियों से पट्टी बाँधी। कुछ देर बाद हिरण धीरे-धीरे खड़ा हो गया। अजय खुश हुआ और बोला,
“सच्चा साहसी वही है, जो केवल अपनी नहीं, दूसरों की भी मदद करता है।”

हैरानी की बात यह हुई कि हिरण ने अजय को नदी पार करने का रास्ता दिखा दिया।

कठिन चढ़ाई

अब अजय पर्वत की तलहटी तक पहुँच चुका था। सामने खड़ी चट्टानों को देखकर वह घबरा गया। पत्थर फिसलन भरे थे, ऊपर घना कोहरा छाया था। लेकिन उसने अपने मन को समझाया,
“अगर लक्ष्य ऊँचा है तो रास्ता कठिन होगा ही। संघर्ष के बिना सफलता का स्वाद अधूरा है।

रस्सी की मदद से वह धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। कई बार उसके हाथ फिसले, कई बार वह गिरते-गिरते बचा। उसके घुटनों से खून भी निकल आया, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

मंज़िल का दृश्य

कई दिनों के संघर्ष के बाद आखिरकार अजय शिखर पर पहुँचा। वहाँ से पूरा गाँव, जंगल और नदी दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवाओं के बीच उसने अपनी बाहें फैलाकर कहा,
“यही है जीवन का असली सुख – जब इंसान अपने डर को जीतकर अपनी मंज़िल पाता है।”

वहाँ बैठे साधुओं ने उसकी ओर मुस्कुराकर देखा और बोले,
“अजय, तूने केवल पर्वत नहीं जीता, बल्कि अपनी हिम्मत, आत्मविश्वास और धैर्य से पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन गया है।”

उन्होंने अजय को “वीर सम्मान” दिया और आशीर्वाद दिया कि वह जीवनभर साहस और प्रेरणा का दीपक जलाए रखे।

गाँव में वापसी

जब अजय गाँव लौटा, तो लोग उसकी जय-जयकार करने लगे। वह सिर्फ़ एक साधारण लड़का नहीं रहा, बल्कि साहस और संघर्ष का प्रतीक बन गया। उसने गाँव के बच्चों को सिखाया,
“कभी मत सोचो कि तुम छोटे हो या कमजोर हो। अगर विश्वास मजबूत है तो हर पर्वत छोटा हो जाता है। लक्ष्य वही पाता है जो हार नहीं मानता।

Tags: साहसिक कहानी, प्रेरणादायक कहानी, संघर्ष और सफलता की कहानी, आत्मविश्वास पर कहानी, हिंदी मोटिवेशनल स्टोरी, जीवन बदलने वाली कहानी, लक्ष्य प्राप्त करने की कहानी, कठिनाइयों से लड़ने की कहानी, संघर्ष की प्रेरणा, साहस और आत्मविश्वास, बच्चों के लिए साहसिक और प्रेरणादायक कहानी हिंदी में, संघर्ष और हिम्मत की सच्ची कहानी हिंदी में, सफलता पाने के लिए प्रेरक हिंदी कहानी, Adventure Motivational Story in Hindi, Hindi Story on Courage and Confidence

शुक्रवार, अगस्त 1

समझदार दोस्त

समझदार दोस्त

बहुत समय पहले की बात है, दो अरबी दोस्तों को एक बहुत बड़े खजाने का नक्शा मिला, खजाना किसी रेगिस्तान के बीचो-बीच था।

दोनों ने योजना बनाना शुरू की, खजाने तक पहुँचने के लिए बहुत लम्बा समय लगता और रास्ते में भूख- प्यास से मर जाने का भी खतरा था। बहुत विचार करने पर दोनों ने तय किया कि इस योजना में एक और समझदार दोस्त को शामिल किया जाए, ताकि वे एक और ऊंट अपने साथ ले जा सकें जिस पर खाने-पीने का ढ़ेर सारा सामान भी आ जाए और खजाना अधिक होने पर वे उसे ऊंट पर ढो भी सकें।

पर सवाल ये उठा कि चुनाव किसका किया जाए?

बहुत सोचने के बाद गुरु और बबलू को चुना गया। दोनों हर तरह से बिलकुल एक तरह के थे और कहना मुश्किल था कि दोनों में अधिक बुद्धिमान कौन है? इसलिए एक प्रतियोगिता के जरिये सही व्यक्ति का चुनाव करने का फैसला किया गया।

दोनों दोस्तों ने उन्हें एक निश्चित स्थान पर बुलाया और बोले, “आप लोगों को अपने-अपने ऊंट पर सवार होकर सामने दिख रहे रास्ते पर आगे बढ़़ना है। कुछ दूर जाने के बाद ये रास्ता दो अलग-अलग रास्तों में बंट जाएगा- एक सही और एक गलत। जो इंसान सही रास्ते पर जाएगा वही हमारा तीसरा साथी बनेगा और खजाने का एक-तिहाई हिस्सा उसका होगा।”

दोनों ने आगे बढ़ना शुरू किया और उस बिंदु पर पहुँच गए जहाँ से रास्ता बंटा हुआ था।

वहां पहुँच कर गुरु ने इधर-उधर देखा, उसे दोनों रास्तों में कोई अंतर समझ नहीं आया और वह जल्दी से बांये तरफ बढ़़ गया। जबकि, बबलू बहुत देर तक उन रास्तों की ओर देखता रहा, और उन पर आगे बढ़ने के नतीजे के बारे में सोचता रहा।

करीब 1 घंटे बाद बायीं ओर के रास्ते पर धूल उड़ती दिखाई दी। गुरु बड़ी तेजी से उस रास्ते पर वापस आ रहा था।

उसे देखते ही बबलू मुस्कुराया और बोला, “गलत रास्ता ?”

“हाँ, शायद!”, गुरु ने जवाब दिया।

दोनों दोस्त छुप कर यह सब देख रहे थे और वे तुरंत उनके सामने आये और बोले, “बधाई हो!”

“शुक्रिया!”, बबलू ने फ़ौरन जवाब दिया।

“तुम्हे नहीं, हमने गुरु को चुना है।”, दोनों दोस्त एक साथ बोले।

“पर गुरु तो गलत रास्ते पर आगे बढ़ा था… फिर उसे क्यों चुना जा रहा है?”, बबलू गुस्से में बोला।

“क्योंकि उसने ये पता लगा लिया कि गलत रास्ता कौन है और अब वो सही रास्ते पर आगे जा सकता है, जबकि तुमने पूरा वक़्त बस एक जगह बैठ कर यही सोचने में गँवा दिया कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत। समझदारी किसी चीज के बारे में ज़रूरत से ज्यादा सोचने में नहीं बल्कि एक समय के बाद उस पर काम करने और तजुर्बे से सीख लेने में है।”, दोस्तों ने अपनी बात पूरी की, और खजाने की तरफ चल दिये, बबलू बैठा बैठा वहीं पछताता रहा..!!

शिक्षा:- हमारे जीवन में भी कभी न कभी ऐसा स्थान (समय) आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत और ऐसे में बहुत से लोग बस सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं, जबकि ज़रुरत इस बात की है कि चीजों को विश्लेषण करने की बजाय गुरुजी की तरह अपने विकल्प को समझ करके निर्णय लिया जाए और अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ा जाए।