मंगलवार, सितंबर 29

चार आने का हिसाब

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है। चंदनपुर नाम का एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहाँ का राजा वीर, न्यायप्रिय और प्रजा का हित चाहने वाला था। उसके राज्य में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। चारों ओर खुशहाली थी, महल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी और राजकोष भी धन से भरा रहता था।

लेकिन राजा के पास एक ऐसी चीज़ नहीं थी, जिसे वह सबसे अधिक चाहता था - मन की शांति।

रात को सोने के लिए जाते समय उसके मन में न जाने कितने विचार घूमते रहते। कभी वह सोचता, "मेरे पास इतना धन है, फिर भी मन बेचैन क्यों है?"

कभी वह विद्वानों को बुलाता, कभी साधु-संतों से मिलता और कभी दूर-दराज़ से आए ज्ञानी लोगों से अपनी समस्या का समाधान पूछता। लेकिन किसी की बात उसके मन को संतुष्ट नहीं कर पाती।

एक दिन राजा ने सोचा,
"शायद मुझे महल से बाहर निकलकर अपनी प्रजा के बीच जाना चाहिए। हो सकता है, किसी साधारण व्यक्ति के जीवन में मुझे उस शांति का रहस्य मिल जाए, जिसे मैं इतने वर्षों से खोज रहा हूँ।"

अगले ही दिन राजा ने साधारण कपड़े पहने और भेष बदलकर अकेले राज्य की सैर पर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह शहर से दूर एक खेत के पास पहुँचा। वहाँ उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी।

किसान के शरीर पर पुराने और जगह-जगह से फटे कपड़े थे। चेहरे पर मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसके पास न कोई आलीशान घर था, न महल, न धन-दौलत।

लेकिन एक चीज़ देखकर राजा ठिठक गया।

किसान पेड़ की छाँव में बैठकर अपना साधारण-सा भोजन खा रहा था और उसके चेहरे पर अजीब-सी संतुष्टि और खुशी थी।

राजा कुछ देर तक उसे देखता रहा।

उसने मन ही मन सोचा,
"मेरे पास इतना धन है, फिर भी मेरे चेहरे पर वह खुशी नहीं है जो इस गरीब किसान के चेहरे पर दिखाई दे रही है।"

राजा के मन में किसान की मदद करने का विचार आया। उसने अपनी जेब से चार स्वर्ण मुद्राएँ निकालीं और किसान के पास जाकर बोला,

"भाई, मैं एक राहगीर हूँ। मुझे ये चार स्वर्ण मुद्राएँ तुम्हारे खेत में पड़ी मिली हैं। लगता है ये तुम्हारी ही होंगी। तुम इन्हें रख लो।"

किसान ने स्वर्ण मुद्राओं की ओर देखा और मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।

"नहीं सेठ जी, ये मेरी नहीं हैं।"

राजा ने आश्चर्य से पूछा,
"तुम्हें कैसे पता कि ये तुम्हारी नहीं हैं?"

किसान बोला,
"क्योंकि मैंने इन्हें कमाया नहीं है। आप इन्हें अपने पास रखिए या किसी जरूरतमंद को दे दीजिए।"

राजा को यह बात कुछ अजीब लगी।

उसने कहा,
"भाई, धन को कौन ठुकराता है? धन से जीवन आसान होता है। तुम इन्हें रख लो। तुम्हें इनकी ज़रूरत पड़ेगी।"

किसान हँस पड़ा।

"सेठ जी, मुझे जितना चाहिए, उतना मेरे पास है।"

राजा ने हैरानी से पूछा,
"और तुम्हें कितना चाहिए?"

किसान ने बड़े सहज भाव से कहा,

"मैं रोज़ चार आने कमाता हूँ और उन्हीं चार आने में खुशी-खुशी अपना जीवन चला लेता हूँ।"

राजा जैसे चौंक गया।

"सिर्फ चार आने?"

किसान ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

राजा ने पूछा,
"तुम इतने कम पैसों में भी खुश रहते हो?"

किसान ने अपनी थाली एक तरफ रखी और बोला,

"सेठ जी, खुशी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमारे पास कितना पैसा है। असली बात यह है कि हमारे पास जो पैसा है, उसका इस्तेमाल हम किस तरह करते हैं।"

राजा किसान की बात सुनकर सोच में पड़ गया।

उसने पूछा,

"अच्छा! तो तुम इन चार आने का करते क्या हो?"

किसान मुस्कुराया और बोला,

"एक आना कुएँ में डाल देता हूँ, दूसरा आना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ, तीसरा उधार दे देता हूँ और चौथा मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा का माथा घूम गया।

"क्या मतलब?"

लेकिन किसान मुस्कुराता हुआ अपने खेत की ओर चला गया।

राजा पीछे से उसे देखता रह गया।

उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—

"एक आना कुएँ में डालना, एक से कर्ज चुकाना, एक उधार देना और एक मिट्टी में गाड़ देना... आखिर इसका मतलब क्या है?"

उस दिन राजा वापस महल तो लौट आया, लेकिन किसान की बात उसके दिमाग से नहीं निकली।

अगली सुबह उसने तुरंत राजसभा बुलाई।

राजा ने दरबारियों को पूरी घटना सुनाई और पूछा,

"बताओ, उस किसान के चार आने का क्या रहस्य है?"

एक दरबारी बोला,
"महाराज, शायद वह कुएँ में सचमुच पैसा डालता होगा।"

दूसरा बोला,
"शायद वह किसी से लिया हुआ कर्ज चुकाता है।"

तीसरे ने कहा,
"संभव है वह किसी जरूरतमंद को पैसे उधार देता हो।"

चौथे ने कहा,
"और शायद वह सच में पैसे जमीन में गाड़ देता हो।"

राजा ने सबकी बातें सुनीं, लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि नहीं आई।

आखिर उसने आदेश दिया,

"उस किसान को ढूँढकर दरबार में लाया जाए।"

कई लोगों को भेजा गया। बहुत खोजबीन के बाद किसान मिल गया।

अगले दिन वह राजा के दरबार में उपस्थित हुआ।

राजा ने इस बार अपना भेष छोड़ दिया और किसान को बताया,

"जिस व्यक्ति से तुम कल मिले थे, वह कोई साधारण राहगीर नहीं, बल्कि तुम्हारा राजा था।"

किसान घबरा गया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

राजा ने मुस्कुराते हुए कहा,

"घबराओ मत। मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। बल्कि तुम्हारी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है।"

राजा ने किसान को अपने पास बैठाया और पूछा,

"कल तुमने कहा था कि तुम अपनी चार आने की कमाई को चार अलग-अलग जगह लगाते हो। मैं आज उसी रहस्य को जानना चाहता हूँ।"

किसान ने विनम्रता से कहा,

"महाराज, इसमें कोई बड़ा रहस्य नहीं है। बस मैंने अपने जीवन की कमाई को चार हिस्सों में बाँट रखा है।"

राजा ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।

किसान ने कहा,

"पहला आना मैं कुएँ में डाल देता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"इसका क्या अर्थ है?"

किसान बोला,

"महाराज, इसका अर्थ है कि मैं अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने परिवार के भरण-पोषण में लगाता हूँ। जैसे कुएँ में पानी डालने से वह पानी हमारे काम आता है, वैसे ही परिवार पर खर्च किया गया धन हमारे जीवन को संभालता है।"

राजा ने सिर हिलाया।

किसान आगे बोला,

"दूसरा आना मैं अपना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"किसका कर्ज?"

किसान मुस्कुराया।

"अपने माता-पिता का।"

राजा चुप हो गया।

किसान बोला,

"महाराज, मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया और जीवन जीना सिखाया। आज जब वे वृद्ध हो गए हैं तो उनकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। उनकी सेवा करके मैं अपने जीवन का वह कर्ज चुकाता हूँ, जिसे कभी पूरी तरह चुकाया नहीं जा सकता।"

दरबार में सन्नाटा छा गया।

किसान ने तीसरे आने की बात शुरू की।

"तीसरा आना मैं उधार दे देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"किसे?"

किसान ने कहा,

"अपने बच्चों को।"

राजा ध्यान से सुनता रहा।

"मैं अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अच्छे संस्कारों पर यह धन खर्च करता हूँ। आज मैं उन पर खर्च कर रहा हूँ, कल जब वे बड़े होंगे तो यही शिक्षा और संस्कार उनके जीवन में लौटकर आएँगे। इसलिए मैं इसे उधार देना कहता हूँ।"

राजा के चेहरे पर अब समझ की चमक दिखाई देने लगी।

फिर किसान ने कहा,

"और चौथा आना मैं मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"यानी बचत?"

किसान मुस्कुराया।

"जी महाराज। मैं अपनी कमाई का थोड़ा हिस्सा भविष्य के लिए बचाकर रखता हूँ। ताकि जब कभी कठिन समय आए तो मुझे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। और यदि आवश्यकता न पड़े तो उस धन का उपयोग किसी धार्मिक, सामाजिक या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता में कर सकूँ।"

राजा कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत बैठा रहा।

फिर उसने गहरी साँस ली।

उसे अचानक एहसास हुआ कि वह जिस शांति को वर्षों से महल, धन और विद्वानों के बीच खोज रहा था, उसका रास्ता तो इस साधारण किसान को पहले से मालूम था।

राजा ने किसान से कहा,

"आज तुमने मुझे वह बात सिखा दी, जो मेरे सारे विद्वान नहीं सिखा सके।"

किसान ने सिर झुकाकर कहा,

"महाराज, मैंने तो बस अपनी जिंदगी जीने का तरीका बताया है।"

राजा मुस्कुराया।

लेकिन उस दिन से राजा की सोच बदल गई।

अब वह केवल यह नहीं सोचता था कि उसके पास कितना धन है।

वह यह सोचने लगा कि-

"मेरे पास जो धन है, उसका सही उपयोग कितना है?"

उसने अपने जीवन में परिवार, माता-पिता, बच्चों, भविष्य और समाज के लिए धन का उचित हिस्सा निर्धारित करना शुरू किया।

धीरे-धीरे उसके मन की बेचैनी कम होने लगी।

उसे समझ आ गया कि धन अपने आप में खुशी नहीं देता। धन का सही उपयोग ही जीवन में संतोष ला सकता है।

रविवार, सितंबर 13

घड़े की कहानी

घड़े की कहानी

संतों की सभा और एक साधारण-सा घड़ा

एक शांत स्थान पर संतों की एक सभा लगी हुई थी। चारों ओर भक्ति, शांति और आध्यात्मिक वातावरण था। दूर-दूर से आए संत एकत्र होकर ईश्वर की चर्चा कर रहे थे। सभा के एक कोने में मिट्टी का एक साधारण-सा घड़ा रखा हुआ था। उस घड़े में निर्मल गंगाजल भरा गया था, ताकि प्यास लगने पर संतजन उसमें से जल ग्रहण कर सकें।

सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देखने लगा। कुछ देर बाद उसके मन में विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। वह सोचने लगा, "कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न जाने कितने घड़ों में पानी भरा होगा, लेकिन इसे तो गंगाजल रखने का सौभाग्य मिला है। ऊपर से संतों की सेवा का अवसर भी! संत इसे छुएंगे, इससे जल ग्रहण करेंगे... सचमुच इसकी किस्मत तो बहुत अच्छी है।"

जब घड़े ने अपनी कहानी सुनाई

वह व्यक्ति अभी इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि अचानक उसे लगा जैसे घड़ा उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहा है। तभी एक धीमी-सी आवाज सुनाई दी, "बंधु, क्या सच में तुम्हें लगता है कि मैं भाग्यशाली पैदा हुआ था?" वह व्यक्ति चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन आसपास कोई नहीं था। फिर घड़े की आवाज आई, "तुम्हें मेरी आज की स्थिति दिखाई दे रही है, लेकिन मेरी पूरी कहानी नहीं। अगर सुनना चाहते हो, तो मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं।"

घड़ा जैसे वर्षों पुरानी यादों में खो गया और बोला, "एक समय था जब मैं सिर्फ मिट्टी था। जमीन के अंदर पड़ा हुआ, बिल्कुल साधारण और किसी काम का नहीं। न मेरी कोई पहचान थी और न कोई ऐसा उद्देश्य, जिससे मुझे लगता कि मेरा जीवन सार्थक है। फिर एक दिन एक कुम्हार वहां आया। उसने फावड़ा उठाया और मुझे खोदना शुरू कर दिया। फावड़े की हर चोट मुझे दर्द देती थी। मैं सोचता था कि आखिर मैंने ऐसा क्या अपराध किया है, जो मेरे ऊपर इतनी चोटें की जा रही हैं? मुझे क्या पता था कि वही चोटें मेरे नए जीवन की पहली सीढ़ी हैं।"

मिट्टी से घड़ा बनने की कठिन यात्रा

घड़ा आगे बोला, "कुम्हार मुझे गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां पहुंचते ही उसने मुझे पैरों से रौंदना शुरू कर दिया। फिर मेरे अंदर पानी डाला, मुझे बार-बार गूंथा और मेरी पुरानी अवस्था को पूरी तरह बदलने लगा। मैं भीतर से टूटता जा रहा था और मन ही मन भगवान से शिकायत करता था कि पहले फावड़े की चोटें और अब पैरों से कुचलना... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?" लेकिन कुम्हार रुका नहीं। उसने मुझे चाक पर चढ़ा दिया। चाक तेजी से घूमने लगा और कुम्हार कभी मुझे दबाता, कभी खींचता और कभी थपथपाकर आकार देता। कभी मैं इधर झुकता तो कभी उधर। मुझे लग रहा था कि मेरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। मैं सोचता था कि शायद भगवान ने मेरे लिए केवल कष्ट ही लिखे हैं।

लेकिन मेरी परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे उठाया और भट्ठी के अंदर डाल दिया। चारों ओर आग थी और भीषण गर्मी से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उस समय मैंने पहली बार भगवान से शिकायत की। मैंने मन ही मन कहा, "हे प्रभु! आखिर मेरी गलती क्या है? पहले खोदा, फिर कुचला, फिर चाक पर घुमाया और अब आग में जला रहे हो। अगर आप सच में हैं, तो मुझे बचाते क्यों नहीं?" लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आग बढ़ती गई और मैं तपता रहा।


जिसे मैं सजा समझ रहा था, वह मेरी तैयारी थी

आखिर एक दिन भट्ठी का दरवाजा खुला और मैं बाहर आया। मैं वही मिट्टी नहीं था, जो कभी जमीन के अंदर पड़ी रहती थी। अब मैं एक घड़ा बन चुका था। लेकिन मेरी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे गधे पर लादा और बाजार में ले गया। वहां लोग मुझे उठाकर देखते, घुमाते और ठोक-ठोककर जांचते कि मैं ठीक हूं या नहीं। हर ठोकर मुझे फिर चोट जैसी लगती थी। मैं सोचता था कि इतना सब सहने के बाद भी लोग मुझे क्यों परख रहे हैं? और जब आखिरकार मेरी कीमत लगाई गई, तो वह भी केवल 20-30 रुपये! उस समय मैं अंदर से पूरी तरह टूट गया। मैंने आसमान की ओर देखकर कहा, "हे भगवान! मेरी इतनी सारी पीड़ा की कीमत बस इतनी सी है?"

फिर मेरी जिंदगी बदल गई

घड़ा कुछ क्षण के लिए शांत हुआ और फिर बोला, "लेकिन मेरी असली कहानी तो इसके बाद शुरू हुई। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और अपने घर ले गए। मुझे लगा था कि शायद अब मुझे किसी कोने में रख दिया जाएगा। लेकिन उन्होंने मेरे अंदर गंगाजल भरा और मुझे संतों की इस सभा में ले आए। आज मैं यहां रखा हूं। संत मेरे पास आते हैं, मेरे अंदर भरे गंगाजल को ग्रहण करते हैं और लोग मुझे देखकर कहते हैं कि मैं कितना भाग्यशाली हूं।"

घड़े ने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, "लेकिन आज मुझे अपनी पूरी कहानी समझ में आती है। अगर उस दिन कुम्हार ने मुझे फावड़े से नहीं खोदा होता तो मैं मिट्टी ही पड़ा रहता। अगर उसने मुझे पैरों से नहीं रौंदा होता तो मैं कभी आकार नहीं ले पाता। अगर उसने मुझे चाक पर नहीं घुमाया होता तो मैं घड़ा नहीं बनता। अगर उसने मुझे आग में नहीं तपाया होता तो मैं मजबूत नहीं बनता। और अगर बाजार में लोगों ने मुझे ठोककर नहीं परखा होता तो मेरी मजबूती का पता कैसे चलता?"

फिर घड़े ने कहा, "जिसे मैं उस समय भगवान का अन्याय समझ रहा था, आज वही उनकी सबसे बड़ी कृपा दिखाई दे रही है। उस समय मुझे केवल दर्द दिखाई देता था, अपना भविष्य नहीं। इसलिए हर चोट मुझे सजा लगती थी। आज समझ आया कि भगवान मुझे तोड़ नहीं रहे थे, बल्कि मुझे उस योग्य बना रहे थे, जिसके लिए मेरा जन्म हुआ था।"

हमारी जिंदगी भी उस घड़े जैसी है

घड़े की कहानी सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर तक शांत बैठा रहा। उसके मन में जैसे कई सवालों के जवाब मिल गए थे। सच तो यह है कि हमारी जिंदगी भी उस घड़े से अलग नहीं है। कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते। कभी मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलती, कभी कोई रास्ता अचानक बंद हो जाता है, कभी अपने ही लोग साथ छोड़ देते हैं और कभी ऐसा लगता है कि हमने भगवान से इतनी प्रार्थनाएं कीं, इतने प्रयास किए, फिर भी हमारी सुनवाई क्यों नहीं हो रही।

ऐसे समय में हम भी उस मिट्टी की तरह सोचने लगते हैं, "आखिर मेरे साथ ही क्यों?" लेकिन समस्या यह है कि हमें केवल वर्तमान दिखाई देता है, भविष्य नहीं। हमें दर्द दिखाई देता है, उसके पीछे छिपा उद्देश्य नहीं दिखाई देता। हमें बंद दरवाजा दिखाई देता है, लेकिन यह नहीं पता होता कि शायद उसी दरवाजे के पीछे हमारे लिए कोई बेहतर रास्ता तैयार हो रहा है।

हर कठिनाई का एक उद्देश्य हो सकता है

कुम्हार मिट्टी को इसलिए नहीं रौंदता कि वह उससे नफरत करता है। वह मिट्टी को इसलिए गूंथता और आकार देता है क्योंकि वह जानता है कि बिना उस प्रक्रिया के एक सुंदर और मजबूत घड़ा तैयार नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जीवन की हर कठिन परिस्थिति हमेशा सजा नहीं होती। कई बार वह हमारे व्यक्तित्व को मजबूत करने, हमारी सोच को बदलने और हमें किसी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य बनाने की तैयारी होती है।

जिस तरह मिट्टी को यह पता नहीं होता कि वह एक दिन घड़ा बनेगी, उसी तरह इंसान को भी अक्सर यह पता नहीं होता कि उसकी आज की परेशानी उसके कल की पहचान बनने वाली है। इसलिए जब जीवन आपको चाक पर घुमाए, परिस्थितियां आपको रौंदें, समय आपको आग में तपाए और लोग आपको ठोक-ठोककर परखें, तो तुरंत यह मत मान लेना कि भगवान ने आपको छोड़ दिया है। हो सकता है, आपके जीवन का सबसे सुंदर रूप अभी बन ही रहा हो।


परीक्षा के समय विश्वास मत खोइए

जीवन की कठिन परीक्षा के दौरान सबसे जरूरी है कि हम सत्य और न्याय का रास्ता न छोड़ें। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने संस्कार, ईमानदारी और विश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। ईश्वर की कृपा किसी के जीवन में जल्दी दिखाई देती है तो किसी के जीवन में देर से, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर ने किसी को भुला दिया है।

कई बार हमें लगता है कि हमारी प्रार्थनाएं स्वीकार नहीं हो रहीं, लेकिन संभव है कि ईश्वर हमारी इच्छा पूरी करने से पहले हमें उसके योग्य बना रहे हों। आखिर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपता जिसे गाड़ी चलाना ही न आता हो। उसी तरह ईश्वर भी अपनी बड़ी कृपा और बड़ी जिम्मेदारियां उसी व्यक्ति को सौंपते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रख सके और सही रास्ते पर टिक सके।

अंत में बस इतना याद रखिए

जब भी जीवन में कोई कठिन दौर आए, तो एक बार उस घड़े को जरूर याद कीजिए। याद रखिए कि फावड़े की चोट, पैरों से कुचला जाना, चाक पर घूमना, आग में तपना और बाजार में ठोकरें खाना, इनमें से कोई भी घटना उस घड़े को नष्ट करने के लिए नहीं थी। हर कष्ट उसे उसके वास्तविक रूप तक पहुंचाने की तैयारी था।

हो सकता है आज आप भी अपनी जिंदगी के किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हों और आपको समझ नहीं आ रहा हो कि आपके साथ ही इतना कुछ क्यों हो रहा है। लेकिन शायद आपकी कहानी भी अभी अधूरी है। शायद जो कुछ आज आपको अन्याय लग रहा है, वही कल आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाए।

इसलिए परिस्थितियों से घबराइए मत, ईश्वर पर विश्वास रखिए और सत्य के रास्ते से कभी मत हटिए।

क्योंकि हो सकता है-

"जिस दर्द को आप आज अपनी सजा समझ रहे हैं, वही कल आपकी सबसे बड़ी कृपा की वजह बन जाए।"

और याद रखिए, मिट्टी को जब तक आग में नहीं तपाया जाता, तब तक वह घड़ा नहीं बनती। उसी तरह इंसान भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर ही अपने वास्तविक सामर्थ्य को पहचानता है।

गुरुवार, जून 18

राम नाम का चमत्कार

राम नाम का चमत्कार

एक बार एक गांव में एक साधु रहता था, सारा दिन राम-राम जपता रहता और ढोलकी बजाकर कीर्तन करता रहता| उसकी कुटिया के पास जिस व्यक्ति का घर था, वह उससे बहुत परेशान था|  एक दिन वह व्यक्ति गुस्से में उस साधु की कुटिया में चला गया और कहने लगा कि तुम क्या दिन-रात राम-राम रटते रहते हो? तुम्हें तो कोई काम धंधा नहीं है, हमें तो कमाने जाना पड़ता है, तुम्हारी ढोलकी की आवाज से मैं सो नहीं पाता.

साधु कहने लगा - "तुम भी मेरे साथ राम-राम जप के देखो तब तुम्हें पता चलेगा कितना आनंद आता है|" उस व्यक्ति ने थोड़ा खींझकर कहा,"अगर मैं तुम्हारे साथ राम-राम जपता हूं तो क्या तुम्हारा राम मुझे खाने के लिए रोटी देगा? साधु कहने लगा कि "मुझे तो राम नाम की लगन लगी है मुझे तो राम जी की कृपा से हर रोज भोजन मिल ही जाता है| तुम भी राम-राम जप के देख लो मुझे भरोसा है भगवान तुझे खाने को जरूर देगा|

वह आदमी उस साधु को चुनौती देता है कि मैं तुम्हारे साथ आज राम-राम का भजन करता हूं, अगर तुम्हारे राम ने आज मुझे रोटी खिला दी तो सारी उम्र राम की भक्ति में लगा दूंगा| अगर नहीं खिलाई तो तुम ढोलकी बजाना बंद कर दोगे| साधू कहता है कि मैंने तो निष्काम भाव से प्रभु राम की भक्ति की है लेकिन फिर भी मुझे तुम्हारी चुनौती मंजूर है| 

वह व्यक्ति साधु के साथ बैठकर राम-राम का जाप करता है और मन में निश्चय करता है कि चाहे कुछ हो जाए मैं आज भोजन नहीं करूँगा, देखता हूँ इसका राम मुझे कैसे भोजन कराता है| राम-राम का भजन करने के बाद वह सोचता है कि अगर अब मैं घर जाता हूं तो मेरी मां और बीवी मुझे खाने को कहेंगे और मुझे रोटी खानी पड़ सकती है| लेकिन मुझे साधु को चुनौती में हराना है इसलिए वह घर जाने की बजाए गांव के पास के जंगल में चला जाता है|

जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर बैठ जाता है, वह सोचता है कि मैं सारा दिन इस पेड़ से उतरूंगा ही नहीं, अन्न का दाना भी नहीं खाऊंगा, इस तरह मैं साधु को हरा दूंगा और उसका ढोलकी बजाना बंद हो जाएगा|

कुछ देर बाद उस जंगल से एक बंजारों की टोली गुजरती है|

उन्हें भूख लगी होती है तो बंजारों का सरदार कहता है कि आग जलाकर यहीं पर खाना बना लो, अब खाना खाकर ही आगे बढ़ेंगे, खाना बन कर तैयार हो जाता है| बंजारे खाना खाने ही वाले होते हैं, कि इतनी देर में बंजारों को सूचना मिलती है कि पीछे से डाकू आ रहे हैं तो बंजारों का सरदार कहता है कि हमें यहां से चले जाना चाहिए|

डाकू हमारा सब कुछ लूट सकते हैं, वे बंजारे खाना वही पर छोड़ कर चले जाते हैं, वह आदमी पेड़ पर चढा़ सब कुछ देख रहा था| कुछ समय बाद डाकू वहां पहुंच जाते हैं, भोजन को देखकर डाकू कहते हैं कि खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है, लेकिन यह भोजन किसने बनाया? बनाने के बाद खाया क्यों नहीं? कहीं किसी की चाल तो नहीं हमें फसाने की? हो सकता है इस भोजन में जहर हो| 

उसी समय डाकुओं के सरदार की नजर उस व्यक्ति पर पड़ी, वह उसे नीचे आने का आदेश देता है| डाकू उस व्यक्ति से पूछते हैं,"हमें मारने के लिए, क्या भोजन तुमने बनाया है?

वह बेचारा मिन्नते करता रहता है कि मैंने यह भोजन नहीं बनाया, इसमें जहर नहीं है|

यह भोजन बंजारों ने बनाया है आपके आने की खबर सुनकर वह जहां से भाग गए, लेकिन डाकूओं के आगे उसकी एक नहीं चली| डाकू उससे कहते हैं कि अब तुम्हें यह भोजन खा कर दिखाना पड़ेगा, क्योंकि हमें लगता है कि तुमने ही यह भोजन बनाया है और इसमें जहर मिलाया?

अब तुम ही सबसे पहले यह भोजन खाओगे, वह जिद्द पर अड़ा रहता है मैं यह भोजन नहीं खाऊंगा, किसी कीमत पर नहीं खाऊंगा| डाकूओं का शक ओर गहरा हो जाता है, वे बंदूक की नोक उसके सिर पर रखकर कहते हैं तुझे यह भोजन खाना पड़ेगा, नहीं तो गोली खानी पड़ेगी|

वह व्यक्ति भोजन कर रहा था और साधु को याद करते करते आंसू उसकी आँखों से बह रहे थे|

उसने कहा था कि मेरा निश्चय है कि राम नाम जप लेगा तो राम तुझे भोजन भी देंगे, उसके भोजन करने के बाद डाकूओं ने उसे छोड़ दिया| अब उसे विश्वास हो गया कि बंजारों को और डाकूओं को राम जी ने ही भेजा है| वह सीधा साधू की कुटिया में चला गया और जा कर उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सारा वृतांत सुनाया|

अब उस साधु से भी ज्यादा उसे राम नाम की लगन लग गई, उसने अपना पूरा जीवन राम जी को समर्पित कर दिया..!!

सोमवार, जून 15

जब तक दीपक जलता है

जब तक दीपक जलता है

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक युवक रहता था। उसका परिवार बेहद साधारण था। पिता लकड़ियाँ काटकर घर चलाते थे और माँ गाँव के लोगों के कपड़े सिलती थीं। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए रात को मिट्टी के दीपक की रोशनी में ही काम होता था। मोहन बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था। वह अक्सर गाँव के बाहर पहाड़ी पर बैठकर दूर शहर की चमकती रोशनियों को देखा करता था। उसे लगता था कि उन रोशनियों के पीछे कोई ऐसी दुनिया है जहाँ सपने सच होते हैं। लेकिन गाँव के लोग उसकी बातों पर हँसते थे। वे कहते, "मोहन, बड़े सपने देखने से कुछ नहीं होता। गरीब आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए।" मोहन उनकी बातें सुनता जरूर था, लेकिन अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने देता था।

एक छोटी-सी सीख

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उन्होंने लोगों को जीवन के बारे में कई बातें बताईं। जब सभा समाप्त हुई तो मोहन उनके पास गया और बोला, "महाराज, मैं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास न साधन हैं और न ही अवसर। मैं क्या करूँ?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "बेटा, रात का अंधेरा कभी सूरज को रोक नहीं सकता। लेकिन सूरज बनने के लिए पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

मोहन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन उसने इसे अपने दिल में बसा लिया।

संघर्ष का दौर

कुछ वर्षों बाद पिता की तबीयत खराब हो गई। घर की जिम्मेदारी मोहन के कंधों पर आ गई। अब उसे दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी पड़ती थीं। शाम को थका हुआ शरीर जवाब दे देता, लेकिन वह फिर भी किताबें लेकर बैठ जाता। कई बार उसकी आँखें नींद से बंद होने लगतीं, फिर भी वह खुद को जगाकर पढ़ाई करता। उसे विश्वास था कि मेहनत का फल एक दिन जरूर मिलेगा। गाँव के कई लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन मोहन ने हार नहीं मानी।

पहली असफलता

एक दिन उसे शहर जाकर एक बड़ी छात्रवृत्ति परीक्षा देने का मौका मिला। उसने महीनों तैयारी की थी। परीक्षा हुई और वह पूरे विश्वास के साथ घर लौटा। लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था। मोहन टूट गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई हो। कई दिनों तक उसने किताबों को हाथ तक नहीं लगाया। उसे लगने लगा कि शायद गाँव वालों की बात सही थी। शायद बड़े सपने सिर्फ अमीर लोगों के लिए होते हैं।

दीपक की याद

एक रात वह उदास होकर घर के बाहर बैठा था। सामने रखा दीपक तेज हवा में भी जल रहा था।

उसे अचानक साधु की बात याद आई - "सूरज बनने से पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

उसने महसूस किया कि एक असफलता उसकी मंजिल नहीं छीन सकती। उस रात उसने फैसला किया कि वह दोबारा प्रयास करेगा।

नया सफर

मोहन अगले दिन शहर चला गया। उसने एक पुस्तकालय में सहायक का काम शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन वहाँ उसे हजारों किताबों तक पहुँच मिल गई। दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। उसने अपने हर खाली मिनट का उपयोग सीखने में किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब वह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए पढ़ रहा था।

बड़ा अवसर

एक वर्ष बाद राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें पूरे प्रदेश के हजारों छात्र भाग लेने वाले थे। मोहन ने भी आवेदन कर दिया। प्रतियोगिता कठिन थी। कई प्रतिभागी बड़े शहरों और प्रतिष्ठित स्कूलों से आए थे।

पहले दिन ही मोहन घबरा गया।

उसे लगा कि वह इन लोगों के सामने टिक नहीं पाएगा।

लेकिन तभी उसने खुद से कहा, "अगर मैं अपनी तुलना दूसरों से करूँगा तो हमेशा कमजोर महसूस करूँगा। मुझे सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।"

यही सोचकर उसने पूरी मेहनत से प्रतियोगिता में भाग लिया।

सफलता का क्षण

कुछ हफ्तों बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र का नाम था - मोहन।

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक छोटे गाँव का लड़का इतनी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। जब यह खबर गाँव पहुँची तो वही लोग, जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। लेकिन मोहन के चेहरे पर घमंड नहीं था। उसे पता था कि यह सफलता सिर्फ एक पड़ाव है।

गाँव के लिए कुछ करने का संकल्प

सफलता मिलने के बाद मोहन ने शहर में ही बसने का निर्णय नहीं लिया। वह अपने गाँव वापस लौटा। उसने देखा कि गाँव के बच्चे आज भी वही कठिनाइयाँ झेल रहे हैं जो उसने झेली थीं। इसलिए उसने गाँव में एक छोटा-सा पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शुरू किया।

शुरुआत में केवल कुछ बच्चे आए। लेकिन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के विद्यार्थी वहाँ पढ़ने आने लगे। मोहन उन्हें सिर्फ किताबें नहीं देता था, बल्कि आत्मविश्वास भी देता था।

जब दीपक सूरज बन गया

कई वर्षों बाद वही गाँव शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

जहाँ पहले लोग बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते थे, अब उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

एक दिन एक छात्र ने मोहन से पूछा, "सर, आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी अंधेरे को कोसा नहीं। मैंने बस अपना दीपक जलाए रखा।"

शिक्षा

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य पर विश्वास रखते हैं और लगातार प्रयास करते रहते हैं, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमती है। असफलता रास्ता रोकने नहीं, बल्कि आपको और मजबूत बनाने के लिए आती है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपना दीपक जलाए रखता है, वही एक दिन सूरज बनकर चमकता है।

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

बुधवार, जून 10

भक्त और भगवान का संबंध

relationship-between-devotee-and-god

एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे। वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 

एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे।

संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले। - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया

भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ, सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडू साथ,

मंगलवार, जून 9

अंधेरे से उजाले तक

from-darkness-to-light

गाँव रामपुर के एक गरीब किसान का बेटा अर्जुन, अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। उसके पास न पैसे थे, न संसाधन, लेकिन उसकी आँखों में एक सपना था, देश का सबसे बड़ा आईपीएस अफसर बनने का।

अर्जुन बचपन से ही होशियार था। दिन में खेतों में पिता का हाथ बँटाता और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता। उसके दोस्त अक्सर कहते, “अर्जुन, तू क्यों अपना सिर फोड़ रहा है? तेरे जैसे गरीब लड़के अफसर नहीं बनते।” लेकिन अर्जुन बस मुस्कुरा कर कहता, “मेरे सपनों की उड़ान, मेरी ज़मीन से नहीं, मेरे हौसले से तय होती है।”

संघर्ष की शुरुआत

एक दिन गाँव में सरकारी अधिकारी आए और किसानों की ज़मीन गलत दस्तावेज़ों के नाम पर ज़ब्त करने लगे। अर्जुन के पिता की ज़मीन भी खतरे में पड़ गई। अर्जुन ने विरोध किया, लेकिन पुलिस वालों ने उसे ग़लत तरीके से पकड़ कर जेल में डाल दिया।

जेल की सलाखों के पीछे अर्जुन ने फैसला किया - अब वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस गरीब के लिए लड़ेगा जिसे सिस्टम ने कुचला है।

एक नई शुरुआत

जेल से छूटने के बाद अर्जुन शहर चला गया। वहाँ वह एक चाय की दुकान पर काम करने लगा, ताकि अपने रहने और पढ़ाई का खर्च निकाल सके। दिनभर काम, रातभर पढ़ाई। कई बार भूखा सो गया, कई बार किताबों पर ही नींद आ गई। लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा।

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद वह UPSC परीक्षा में बैठा। जब रिजल्ट आया, अर्जुन AIR 7 पर था। पूरे गाँव ने पटाखे जलाए, लेकिन अर्जुन के चेहरे पर एक सन्नाटा था—क्योंकि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। वे बेटे की सफलता नहीं देख पाए।

आईपीएस अर्जुन राठौर की वापसी

अर्जुन की पहली पोस्टिंग उसी जिले में हुई जहाँ उसकी ज़मीन छीनी गई थी। अब वह एक अफसर था—आईपीएस अर्जुन राठौर। पहली ही मीटिंग में उसने उस भ्रष्ट अधिकारी को निलंबित किया जिसने उसके पिता को अपमानित किया था।

लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी।

ड्रामा और थ्रिल

रामपुर और उसके आसपास के इलाकों में एक बड़ा भू-माफिया सक्रिय था—नाम था विक्रम ठाकुर। वह राजनीतिक लोगों से मिला हुआ था, और पुलिस भी उससे डरती थी। अर्जुन ने जब अवैध कब्जे की फाइलें खोलीं, तो धमकियाँ आने लगीं।

एक रात अर्जुन की गाड़ी पर हमला हुआ। गोलियाँ चलीं, लेकिन वह बाल-बाल बचा। उसके साथी अफसरों ने कहा, “सर, ठाकुर से भिड़ना आसान नहीं है।” अर्जुन ने दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं भी रामपुर का बेटा हूँ। डरता नहीं, लड़ता हूँ।”

आखिरी मुठभेड़

अर्जुन ने एक रणनीति बनाई। उसने ठाकुर के आदमी को गिरफ्तार कर गुप्त जानकारी हासिल की। एक रात, पुलिस टीम के साथ अर्जुन ठाकुर के गोदाम पर छापा मारने पहुँचा। वहाँ भारी गोलीबारी हुई। धुएँ और अंधेरे के बीच अर्जुन ने खुद ठाकुर का पीछा किया। छत पर आमना-सामना हुआ।

ठाकुर बोला, “तू मुझे नहीं पकड़ सकता, मैं सिस्टम हूँ।”    

अर्जुन ने कहा, “सिस्टम अब बदल रहा है।”

एक जोरदार भिड़ंत के बाद, अर्जुन ने ठाकुर को गिरा दिया और हथकड़ी पहनाकर नीचे लाया।

अंत - उजाले की जीत

ठाकुर की गिरफ्तारी ने पूरे जिले में हलचल मचा दी। लोगों को पहली बार यकीन हुआ कि ईमानदारी और साहस से सिस्टम को बदला जा सकता है। अर्जुन ने न सिर्फ अपने पिता की ज़मीन वापस ली, बल्कि गाँव के हर किसान को न्याय दिलाया।

अर्जुन अब सिर्फ एक अफसर नहीं था - वह एक प्रेरणा बन चुका था।

सीख: जिंदगी में चाहे जितनी मुश्किलें आएं, अगर हौसला बुलंद हो और मकसद साफ हो, तो कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती। अंधेरे में डटे रहो, उजाला खुद रास्ता बना लेगा।

शनिवार, सितंबर 13

संघर्ष से सफलता तक

संघर्ष से सफलता तक

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में अजय नाम का लड़का रहता था। बचपन से ही उसके दिल में बड़े सपने थे। वह साधारण परिवार से था, लेकिन उसका सोच असाधारण थी। अजय हमेशा कहता,
“अगर हौसला बुलंद हो, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।”

चुनौती का निमंत्रण

एक दिन गाँव के पास पहाड़ों में रहने वाले साधुओं ने घोषणा की कि जो भी युवक उस कठिन पर्वत शिखर तक पहुँच जाएगा, उसे “वीर सम्मान” और अपने जीवन के लिए प्रेरणा का खजाना मिलेगा। यह पर्वत अब तक किसी ने नहीं चढ़ा था क्योंकि रास्ता खतरनाक और अज्ञात था। गाँव के कई लड़के पीछे हट गए। लेकिन अजय ने ठान लिया कि वह इस चुनौती को स्वीकार करेगा। उसके माता-पिता डर गए और बोले,

“बेटा, ये काम बहुत खतरनाक है।” अजय ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“माँ-पिता जी, खतरे से भागने वाले इतिहास नहीं बनाते। साहस करने वाले ही नया रास्ता दिखाते हैं।”

सफ़र की शुरुआत

अजय ने केवल कुछ जरूरी सामान लिया – एक रस्सी, थोड़े अनाज, और पानी। सुबह सूरज निकलते ही उसने सफ़र शुरू किया।

रास्ते में घना जंगल आया। वहाँ अजय ने कई wild जानवरों की आवाज़ें सुनीं। अचानक एक बड़ा साँप उसके रास्ते में आ गया। अजय ने हिम्मत नहीं हारी। उसने पास पड़ी लंबी टहनी उठाई और साँप को धीरे-धीरे हटाकर आगे बढ़ा।

उसने खुद से कहा, “डर वही जीतता है, जिसे हम जीतने देते हैं। अगर मन मजबूत है तो हर समस्या का हल निकलता है।”

संघर्ष की रात

रात का समय था। अजय ने एक चट्टान के नीचे आराम करने की कोशिश की। लेकिन ठंडी हवाएँ और भूख ने उसे चैन से सोने नहीं दिया। पेट में दर्द हो रहा था, फिर भी उसने हार नहीं मानी। उसने तारों को देखते हुए सोचा,
“ये तारे मुझे याद दिलाते हैं कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, रोशनी की किरणें हमेशा मौजूद रहती हैं। मुझे भी आगे बढ़ना है।”

वह आधी रात तक जागता रहा, लेकिन सुबह होते ही नई ऊर्जा के साथ आगे निकल पड़ा।

दोस्त की मदद

जंगल पार करने के बाद अजय को नदी मिली। पानी का बहाव तेज था। वह सोच ही रहा था कि कैसे पार करे, तभी उसे पास में एक घायल हिरण दिखाई दिया। अजय ने सोचा – अगर मैं इस बेचारे की मदद नहीं करूंगा, तो मेरा साहस अधूरा रहेगा।

उसने बड़ी मेहनत से हिरण का घाव साफ़ किया और पत्तियों से पट्टी बाँधी। कुछ देर बाद हिरण धीरे-धीरे खड़ा हो गया। अजय खुश हुआ और बोला,
“सच्चा साहसी वही है, जो केवल अपनी नहीं, दूसरों की भी मदद करता है।”

हैरानी की बात यह हुई कि हिरण ने अजय को नदी पार करने का रास्ता दिखा दिया।

कठिन चढ़ाई

अब अजय पर्वत की तलहटी तक पहुँच चुका था। सामने खड़ी चट्टानों को देखकर वह घबरा गया। पत्थर फिसलन भरे थे, ऊपर घना कोहरा छाया था। लेकिन उसने अपने मन को समझाया,
“अगर लक्ष्य ऊँचा है तो रास्ता कठिन होगा ही। संघर्ष के बिना सफलता का स्वाद अधूरा है।”

रस्सी की मदद से वह धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। कई बार उसके हाथ फिसले, कई बार वह गिरते-गिरते बचा। उसके घुटनों से खून भी निकल आया, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

मंज़िल का दृश्य

कई दिनों के संघर्ष के बाद आखिरकार अजय शिखर पर पहुँचा। वहाँ से पूरा गाँव, जंगल और नदी दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवाओं के बीच उसने अपनी बाहें फैलाकर कहा,
“यही है जीवन का असली सुख – जब इंसान अपने डर को जीतकर अपनी मंज़िल पाता है।”

वहाँ बैठे साधुओं ने उसकी ओर मुस्कुराकर देखा और बोले,
“अजय, तूने केवल पर्वत नहीं जीता, बल्कि अपनी हिम्मत, आत्मविश्वास और धैर्य से पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन गया है।”

उन्होंने अजय को “वीर सम्मान” दिया और आशीर्वाद दिया कि वह जीवनभर साहस और प्रेरणा का दीपक जलाए रखे।

गाँव में वापसी

जब अजय गाँव लौटा, तो लोग उसकी जय-जयकार करने लगे। वह सिर्फ़ एक साधारण लड़का नहीं रहा, बल्कि साहस और संघर्ष का प्रतीक बन गया। उसने गाँव के बच्चों को सिखाया,
“कभी मत सोचो कि तुम छोटे हो या कमजोर हो। अगर विश्वास मजबूत है तो हर पर्वत छोटा हो जाता है। लक्ष्य वही पाता है जो हार नहीं मानता।”

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