गुरुवार, अक्टूबर 8

अनमोल पत्थर की प्रेरक कहानी

अनमोल पत्थर की प्रेरक कहानी

एक शाम एक व्यक्ति अकेला बैठा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी और आंखों में निराशा थी। वह काफी देर से अपने जीवन के बारे में सोच रहा था। बार-बार असफलताओं ने उसका आत्मविश्वास तोड़ दिया था। उसे लगने लगा था कि शायद उसमें कोई काबिलियत ही नहीं है और शायद उसका जीवन किसी काम का नहीं।

वह आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन बोला, "आखिर मेरी जिंदगी की कीमत क्या है? मैंने कोशिश तो बहुत की, लेकिन हर बार असफलता ही मिली। शायद मैं किसी काम का नहीं हूं।"

तभी अचानक उसके सामने भगवान प्रकट हुए।

भगवान को अपने सामने देखकर वह व्यक्ति हैरान रह गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए और उसने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मुझे जिंदगी में बहुत असफलताएं मिली हैं। अब मैं पूरी तरह निराश हो चुका हूं। मुझे बताइए, आखिर मेरे इस जीवन की कीमत क्या है?"

भगवान मुस्कुराए। उन्होंने कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। इसके बजाय अपनी मुट्ठी खोली और उसमें से एक लाल रंग का चमकदार पत्थर निकालकर उस व्यक्ति के हाथ में रख दिया।

भगवान ने कहा, "तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें खुद मिलेगा। इस पत्थर की कीमत पता करके मेरे पास वापस आना। लेकिन एक बात याद रखना - इसे किसी भी कीमत पर बेचना मत।"

व्यक्ति को बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने भगवान की आज्ञा मानी और पत्थर लेकर अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।

पहली कीमत - सिर्फ कुछ संतरे

सबसे पहले वह एक फल वाले की दुकान पर पहुंचा। उसने पत्थर अपनी हथेली पर रखा और फल वाले से पूछा, "भाई, तुम इस पत्थर की कितनी कीमत दोगे?"

फल वाले ने पत्थर को देखा, हाथ में लेकर पलटा और फिर बोला, "देखो भाई, मुझे तो इसकी कोई खास कीमत समझ नहीं आ रही। ऐसा करो, तुम मुझसे दस संतरे ले जाओ और बदले में यह पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति कुछ पल चुप रहा। फिर उसे भगवान की बात याद आई - "पत्थर को बेचना नहीं है।"

उसने मुस्कुराकर कहा, "नहीं भाई, मैं इसे बेच नहीं सकता।"

और वह वहां से आगे बढ़ गया।

उसके मन में एक सवाल जरूर आया - "क्या सच में इस पत्थर की कीमत सिर्फ दस संतरे जितनी है?"

दूसरी कीमत - एक बोरी आलू

अब वह एक सब्जी वाले के पास पहुंचा। उसने वही सवाल दोहराया, "भाई, यह पत्थर कितने का खरीदोगे?"

सब्जी वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा, "अगर तुम्हें बेचना ही है तो मैं तुम्हें एक बोरी अच्छे आलू दे सकता हूं। पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति ने फिर सिर हिलाया।

"नहीं, मैं इसे बेच नहीं सकता।"

वह आगे बढ़ गया।

अब उसके मन में उलझन और बढ़ गई थी। एक व्यक्ति के लिए पत्थर दस संतरे के बराबर था और दूसरे के लिए एक बोरी आलू के।

लेकिन उसकी असली कीमत आखिर थी कितनी?

तीसरी जगह बदल गई पूरी कहानी

चलते-चलते वह एक सुनार की दुकान पर पहुंचा। दुकान में सोने और चांदी के आभूषण चमक रहे थे। उसने पत्थर सुनार के सामने रख दिया और पूछा, "क्या आप बता सकते हैं कि यह पत्थर कितने का है?"

सुनार ने पत्थर उठाया और उसे ध्यान से देखने लगा।

पहले उसने उसे एक तरफ से देखा।

फिर दूसरी तरफ से।

फिर रोशनी के सामने रखकर जांचा।

अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए।

उसने व्यक्ति की ओर देखा और कहा, "मैं तुम्हें इसके बदले एक करोड़ रुपये दूंगा। यह पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति हैरान रह गया।

"एक करोड़?"

जिस पत्थर के बदले अभी कोई दस संतरे दे रहा था, वही पत्थर अब एक करोड़ रुपये का हो गया था!

लेकिन उसे भगवान की बात याद थी।

उसने विनम्रता से कहा, "माफ कीजिए, मैं यह पत्थर बेच नहीं सकता।"

सुनार ने सोचा शायद वह कम कीमत की वजह से मना कर रहा है।

उसने तुरंत कहा, "ठीक है, मैं तुम्हें दो करोड़ रुपये दूंगा। अब तो दे दो!"

व्यक्ति कुछ पल तक उसे देखता रहा। उसके लिए यह विश्वास करना मुश्किल था कि आखिर इस छोटे से पत्थर में ऐसा क्या है जिसकी कीमत दो करोड़ रुपये लगाई जा रही है।

फिर भी उसने पत्थर अपनी जेब में रखा और वहां से निकल गया।

अब वह पहुंचा उस व्यक्ति के पास, जो पत्थर पहचान सकता था

इसके बाद वह एक प्रसिद्ध हीरा व्यापारी की दुकान पर पहुंचा। दुकान में प्रवेश करते ही उसने व्यापारी को पत्थर दिखाया और पूछा, "क्या आप इस पत्थर की कीमत बता सकते हैं?"

हीरे के व्यापारी ने पत्थर को अपने हाथ में लिया।

वह चुप हो गया।

उसने पत्थर को रोशनी में देखा।

फिर दूसरी तरफ से देखा।

उसने उसे अलग-अलग कोणों से जांचा।

समय बीतता गया।

एक मिनट...

पांच मिनट...

दस मिनट...

व्यक्ति बेचैनी से व्यापारी को देखता रहा। आखिर उसने सोचा कि शायद व्यापारी भी इसकी कीमत नहीं समझ पाया।

लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

व्यापारी ने एक साफ मलमल का कपड़ा लिया, उसे मेज पर बिछाया और उस लाल पत्थर को बहुत सम्मान के साथ उसके ऊपर रख दिया।

फिर वह उसके सामने सिर झुकाकर बैठ गया।

व्यक्ति हैरान रह गया।

व्यापारी ने भावुक होकर कहा, "तुम्हें यह कहां मिला?"

व्यक्ति ने पूछा, "क्यों? क्या हुआ?"

व्यापारी की आंखों में आश्चर्य था।

उसने कहा, "तुम शायद नहीं जानते कि तुम्हारे हाथ में क्या है। यह कोई साधारण पत्थर नहीं है। यह इस दुनिया के सबसे अनमोल रत्नों में से एक है। अगर इस दुनिया की पूरी दौलत भी लगा दी जाए, तब भी इसकी वास्तविक कीमत नहीं चुकाई जा सकती। इसे बेचने की बात तो दूर, इसके सामने कीमत लगाना भी मुश्किल है।"

व्यक्ति कुछ बोल नहीं पाया।

उसके दिमाग में अचानक फल वाला, सब्जी वाला और सुनार घूमने लगे।

दस संतरे... एक बोरी आलू... एक करोड़... दो करोड़... और अब - अनमोल!

उसे पहली बार समझ आया कि पत्थर की कीमत नहीं बदली थी। बदली थी तो सिर्फ उसे पहचानने वालों की नजर। सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी था

वह व्यक्ति बिना देर किए भगवान के पास वापस पहुंचा। उसने पूरी कहानी भगवान को सुनाई और फिर भावुक होकर पूछा, "हे प्रभु, अब मुझे बताइए... आखिर मेरे जीवन की कीमत क्या है?"

भगवान मुस्कुराए और बोले, "मैंने तुम्हें तुम्हारे सवाल का उत्तर देने के लिए ही वह पत्थर दिया था। फल वाले ने अपनी जानकारी के अनुसार उसकी कीमत लगाई। सब्जी वाले ने अपनी समझ के अनुसार उसकी कीमत लगाई। सुनार ने उसकी कीमत पहचानी तो करोड़ों तक पहुंच गया। लेकिन हीरे के व्यापारी ने उस पत्थर को पहचान लिया, इसलिए उसके लिए वह अनमोल हो गया।"

भगवान ने आगे कहा, "हे मनुष्य, तुम्हारे जीवन के साथ भी यही होता है। कुछ लोग तुम्हें बहुत साधारण समझेंगे। कुछ तुम्हारी काबिलियत को छोटी चीजों से तौलेंगे। कुछ लोग तुम्हें कम आंकेंगे और कुछ तुम्हारी सफलता पर भी सवाल उठाएंगे। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि तुम्हारी कोई कीमत नहीं है।"

फिर भगवान ने कहा, "हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई ऐसी विशेषता, प्रतिभा और हुनर छिपा होता है, जिसे हर कोई पहचान नहीं सकता। जैसे उस पत्थर को पहचानने के लिए एक पारखी नजर चाहिए थी, वैसे ही इंसान की असली क्षमता पहचानने के लिए भी सही नजर चाहिए।"

अपनी कीमत दूसरों की नजर से मत तय कीजिए

उस दिन उस व्यक्ति को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक मिला। उसे समझ आया कि वह इसलिए छोटा नहीं हो जाता क्योंकि किसी ने उसे छोटा समझ लिया। किसी के द्वारा की गई आलोचना उसकी वास्तविक क्षमता तय नहीं करती। किसी की अस्वीकृति यह साबित नहीं करती कि उसमें प्रतिभा नहीं है और किसी की उपेक्षा यह नहीं बताती कि उसका जीवन बेकार है।

कई बार हम दूसरों की राय को अपनी सच्चाई मान लेते हैं। कोई कह देता है कि "तुमसे नहीं होगा", तो हम मान लेते हैं कि सच में हमसे नहीं होगा। कोई हमारी मेहनत को नजरअंदाज कर देता है तो हम खुद को असफल समझने लगते हैं। कोई हमारी तुलना किसी और से करता है तो हमें अपनी कमियां ही दिखाई देने लगती हैं।

लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि हर व्यक्ति हमारी कीमत पहचानने की क्षमता नहीं रखता।

आपकी असली कीमत समय बताएगा

अगर आज आपको कोई नहीं पहचान रहा, तो निराश मत होइए। अगर आपकी मेहनत का परिणाम अभी दिखाई नहीं दे रहा, तो प्रयास करना मत छोड़िए। अगर लोग आपकी प्रतिभा को नहीं समझ पा रहे हैं, तो अपनी प्रतिभा को निखारना मत छोड़िए।

एक साधारण पत्थर को भी पहचानने के लिए सही पारखी की जरूरत होती है। उसी तरह आपकी क्षमता को पहचानने के लिए भी सही समय, सही अवसर और सही लोगों की जरूरत हो सकती है।

इसलिए अपनी कीमत उन लोगों से मत पूछिए जो आपको समझ ही नहीं पाए। अपनी कीमत पहचानिए, अपने हुनर को निखारिए और धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहिए।

क्योंकि हो सकता है आज दुनिया आपको केवल एक साधारण पत्थर समझ रही हो...

लेकिन आपके भीतर छिपा हुआ अनमोल रत्न अभी सही पारखी के सामने आया ही न हो।

कहानी की सबसे बड़ी सीख

आपकी कीमत किसी दूसरे व्यक्ति की राय से तय नहीं होती। असफलता यह साबित नहीं करती कि आप बेकार हैं और किसी का आपको कम आंकना आपकी वास्तविक क्षमता को कम नहीं कर देता। हर इंसान के भीतर एक विशेष हुनर छिपा होता है। जरूरत केवल उसे पहचानने, निखारने और सही अवसर मिलने तक धैर्य बनाए रखने की है। इसलिए अगर आज कोई आपकी कीमत नहीं पहचान रहा, तो निराश मत होइए। खुद पर विश्वास रखिए। मेहनत करते रहिए। क्योंकि हो सकता है, आप एक ऐसे अनमोल रत्न हों जिसकी कीमत अभी दुनिया ने पहचानी ही नहीं है।

शुक्रवार, अक्टूबर 2

विद्या बड़ी या बुद्धि ?

विद्या बड़ी या बुद्धि ?

बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। उसके चार पुत्र थे। चारों भाई बचपन से ही एक-दूसरे के बहुत करीब थे। साथ खेलते, साथ पढ़ते और हर मुश्किल में एक-दूसरे का साथ देते थे। लेकिन चारों की एक खासियत उन्हें एक-दूसरे से अलग करती थी। पहले तीन भाई शास्त्रों के महान ज्ञाता थे। उन्होंने वर्षों तक कठिन अध्ययन किया था। वे मंत्र, तंत्र और अनेक विद्याओं में पारंगत थे।

लेकिन उनमें एक कमी थी - वे अपनी विद्या पर बहुत घमंड करते थे।

चौथा भाई पढ़ाई में उतना अच्छा नहीं था। उसने शास्त्रों का विशेष अध्ययन नहीं किया था। वह साधारण जीवन जीता था। लेकिन उसमें एक ऐसी खूबी थी जो उसके भाइयों में नहीं थी - वह बहुत बुद्धिमान और समझदार था। वह किसी भी परिस्थिति को ध्यान से देखता, सोचता और फिर निर्णय लेता था।

एक दिन चारों भाइयों ने बैठकर विचार किया। बड़े भाई ने कहा - "हमने इतना अध्ययन किया है। अब समय आ गया है कि अपनी विद्या के बल पर किसी दूसरे राज्य में जाएँ और धन कमाएँ।"

दूसरे भाई ने उत्साह से कहा - "बिल्कुल! राजा और बड़े लोग विद्वानों का सम्मान करते हैं। हमारी विद्या के बदले हमें खूब धन और सम्मान मिलेगा।" 

तीसरा भाई भी उनकी बात से सहमत था। चौथा भाई चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था। कुछ देर बाद चारों भाई यात्रा पर निकल पड़े। लेकिन रास्ते में बड़े भाई ने अचानक कहा - "एक बात सोचने वाली है।" तीसरे भाई ने पूछा - "क्या?"

बड़े भाई ने चौथे भाई की ओर देखते हुए कहा - "हम तीनों ने वर्षों तक शास्त्रों का अध्ययन किया है। लेकिन यह तो कुछ पढ़ा ही नहीं। राजा हमारे ज्ञान का सम्मान करेंगे और हमें धन देंगे। लेकिन इसे देखकर कौन प्रभावित होगा?"

दूसरे भाई ने भी उसकी बात का समर्थन किया। सही कह रहे हो। यह हमारे साथ रहेगा तो हमारी प्रतिष्ठा भी कम होगी। इसे वापस घर चले जाना चाहिए।

चौथे भाई ने सब सुन लिया। उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन तीसरे भाई को अपने भाइयों की बात अच्छी नहीं लगी। उसने कहा - "हम भले ही अलग-अलग विद्या में निपुण हों, लेकिन आखिर हम भाई हैं। हम इसे रास्ते में अकेला कैसे छोड़ सकते हैं? हम जो कमाएँगे, उसमें से कुछ हिस्सा इसे भी दे देंगे।" काफी चर्चा के बाद तय हुआ कि चौथा भाई भी उनके साथ जाएगा। चारों आगे बढ़ते गए।

कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक घने और सुनसान जंगल में पहुँचे। चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। पक्षियों की आवाज़ के अलावा वहाँ कोई दूसरा शोर नहीं था। चलते-चलते अचानक उनकी नजर जमीन पर पड़े कुछ सफेद टुकड़ों पर पड़ी।

वे पास गए तो देखा - वहाँ किसी जानवर की हड्डियों का पूरा ढाँचा पड़ा था। तीनों विद्वान भाइयों की आँखों में अचानक चमक आ गई।

बड़े भाई ने कहा - "भाइयों! हमें अपनी विद्या की परीक्षा लेने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिल सकता।"

दूसरे ने हड्डियों को ध्यान से देखा और बोला - "देखते हैं, हमारी वर्षों की शिक्षा कितनी शक्तिशाली है।"

चौथा भाई कुछ पीछे हट गया। उसने हड्डियों को ध्यान से देखा और पूछा - "लेकिन यह किस जानवर की हड्डियाँ हैं?"

तीनों भाइयों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। बड़े भाई ने अपनी विद्या का प्रयोग शुरू किया।उसने मंत्रों और अपनी कला के बल पर बिखरी हुई हड्डियों को एक जगह इकट्ठा किया। कुछ ही देर में उन हड्डियों से एक पूरा कंकाल तैयार हो गया।

दूसरा भाई आगे बढ़ा - "उसने अपनी विद्या का प्रयोग किया और देखते ही देखते उस कंकाल पर मांस चढ़ने लगा। फिर शरीर पर खाल आ गई। नसों में रक्त का संचार होने लगा।"

अब सामने एक विशाल और भयानक जानवर का शरीर तैयार था। चौथा भाई घबराकर पीछे हट गया। उसने ध्यान से शरीर को देखा और अचानक उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"रुको!"

तीनों भाई उसकी ओर देखने लगे।

चौथा भाई बोला - "तुम जानते भी हो कि तुम किसे जीवित करने जा रहे हो?"

बड़े भाई ने हँसते हुए कहा - "क्यों? अब तुम्हें हमारी विद्या से डर लगने लगा?"

चौथे भाई ने काँपती आवाज़ में कहा - "यह कोई साधारण जानवर नहीं है। ये शेर की हड्डियाँ हैं!"

तीसरा भाई हँस पड़ा।

"तो क्या हुआ?"

चौथा भाई बोला - "अगर तुमने इसे जीवित कर दिया तो यह सबसे पहले हमें ही खा जाएगा!"

तीसरे भाई के चेहरे पर घमंड साफ दिखाई दे रहा था। उसने कहा - "तू हमेशा से डरपोक रहा है। हमने इतनी विद्या वर्षों तक सीखी है और आज तू हमें सिखाएगा कि हमें क्या करना चाहिए?"

चौथा भाई बोला - "मैं तुम्हारी विद्या पर सवाल नहीं उठा रहा। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि हर शक्ति का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता।"

तीसरा भाई बोला - "तुम्हें कुछ नहीं आता, इसलिए तुम हमारी विद्या से डर रहे हो। मैं तो इस शेर को जीवित करके ही रहूँगा।"

चौथे भाई ने देखा कि उसकी बात का कोई असर नहीं हो रहा। उसने कुछ क्षण सोचा। फिर बोला - "ठीक है। अगर तुमने तय ही कर लिया है, तो अपनी विद्या का प्रयोग करो।"

तीनों भाई मुस्कुराए। लेकिन चौथे भाई ने आगे कहा - "बस एक छोटी-सी बात है।"

तीसरे भाई ने पूछा,

"क्या?"

चौथा भाई बोला - "जब तक तुम इसे जीवित करते हो, मैं उस पेड़ पर चढ़ जाता हूँ।" यह कहकर वह तेजी से पास के एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया। तीनों भाइयों ने उसकी ओर देखा और हँसने लगे।

"देखो! डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया!"

लेकिन चौथा भाई चुप रहा। वह ऊपर बैठकर नीचे देखता रहा। तीसरे भाई ने अपनी आँखें बंद कीं।उसने मंत्रों का जाप शुरू किया। जंगल में अचानक अजीब-सी शांति छा गई। हवा जैसे थम गई। कुछ ही क्षण बाद उस मृत शरीर में हलचल होने लगी। पहले उसकी उंगलियाँ हिलीं। फिर उसकी छाती उठने लगी।

फिर अचानक - शेर ने एक जोरदार दहाड़ मारी!

तीनों भाई खुशी से चिल्ला उठे। लेकिन उनकी खुशी अगले ही पल चीख में बदल गई। शेर ने अपनी आँखें खोलीं। उसने सामने खड़े तीनों भाइयों को देखा। उसकी आँखों में भूख थी। तीनों भाइयों को अब अपनी गलती समझ आ चुकी थी। लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। शेर ने एक भयंकर छलांग लगाई। तीनों भाई जान बचाने के लिए भागे, लेकिन शेर उनसे कहीं अधिक तेज था। कुछ ही क्षणों में जंगल में उनकी चीखें गूँजने लगीं।

और फिर...

सब कुछ शांत हो गया। शेर अपने शिकार को खत्म करके जंगल की ओर चला गया। ऊँचे पेड़ पर बैठा चौथा भाई काँपता हुआ यह सब देख रहा था। वह काफी देर तक नीचे उतरने की हिम्मत नहीं कर पाया। जब उसे यकीन हो गया कि शेर बहुत दूर जा चुका है, तब वह धीरे-धीरे पेड़ से नीचे उतरा। उसने अपने तीनों भाइयों को खो दिया था। आँखों में आँसू थे। दिल में गहरा दुख था। वह अकेला अपने घर की ओर लौट पड़ा। रास्ते भर उसके मन में एक ही बात घूमती रही - 

"ज्ञान होना अच्छी बात है, लेकिन उस ज्ञान का सही समय और सही जगह पर इस्तेमाल करना उससे भी अधिक जरूरी है।"

उस दिन उसने अपने भाइयों को खो दिया था, लेकिन उनकी मृत्यु ने उसे जीवन की एक बहुत बड़ी सीख दे दी थी।

कहानी की सीख:


सिर्फ ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है।

ज्ञान तभी उपयोगी है, जब उसके साथ बुद्धि, विवेक और परिस्थिति को समझने की क्षमता भी हो। कभी-कभी इंसान अपनी विद्या, शक्ति, धन या पद पर इतना घमंड करने लगता है कि वह यह भूल जाता है कि हर शक्ति का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता। तीनों भाइयों के पास ज्ञान था, लेकिन उन्होंने बुद्धि की बात नहीं मानी।

चौथे भाई के पास बड़ी-बड़ी विद्याएँ नहीं थीं, लेकिन उसके पास विवेक था, और उसी विवेक ने उसकी जान बचा ली।

इसलिए जीवन में कितना जानते हैं, यह महत्वपूर्ण है।

लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है - "जो जानते हैं, उसका इस्तेमाल कब और कैसे करना है।"

मंगलवार, सितंबर 29

चार आने का हिसाब

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है। चंदनपुर नाम का एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहाँ का राजा वीर, न्यायप्रिय और प्रजा का हित चाहने वाला था। उसके राज्य में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। चारों ओर खुशहाली थी, महल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी और राजकोष भी धन से भरा रहता था।

लेकिन राजा के पास एक ऐसी चीज़ नहीं थी, जिसे वह सबसे अधिक चाहता था - मन की शांति।

रात को सोने के लिए जाते समय उसके मन में न जाने कितने विचार घूमते रहते। कभी वह सोचता, "मेरे पास इतना धन है, फिर भी मन बेचैन क्यों है?"

कभी वह विद्वानों को बुलाता, कभी साधु-संतों से मिलता और कभी दूर-दराज़ से आए ज्ञानी लोगों से अपनी समस्या का समाधान पूछता। लेकिन किसी की बात उसके मन को संतुष्ट नहीं कर पाती।

एक दिन राजा ने सोचा,
"शायद मुझे महल से बाहर निकलकर अपनी प्रजा के बीच जाना चाहिए। हो सकता है, किसी साधारण व्यक्ति के जीवन में मुझे उस शांति का रहस्य मिल जाए, जिसे मैं इतने वर्षों से खोज रहा हूँ।"

अगले ही दिन राजा ने साधारण कपड़े पहने और भेष बदलकर अकेले राज्य की सैर पर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह शहर से दूर एक खेत के पास पहुँचा। वहाँ उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी।

किसान के शरीर पर पुराने और जगह-जगह से फटे कपड़े थे। चेहरे पर मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसके पास न कोई आलीशान घर था, न महल, न धन-दौलत।

लेकिन एक चीज़ देखकर राजा ठिठक गया।

किसान पेड़ की छाँव में बैठकर अपना साधारण-सा भोजन खा रहा था और उसके चेहरे पर अजीब-सी संतुष्टि और खुशी थी।

राजा कुछ देर तक उसे देखता रहा।

उसने मन ही मन सोचा,
"मेरे पास इतना धन है, फिर भी मेरे चेहरे पर वह खुशी नहीं है जो इस गरीब किसान के चेहरे पर दिखाई दे रही है।"

राजा के मन में किसान की मदद करने का विचार आया। उसने अपनी जेब से चार स्वर्ण मुद्राएँ निकालीं और किसान के पास जाकर बोला,

"भाई, मैं एक राहगीर हूँ। मुझे ये चार स्वर्ण मुद्राएँ तुम्हारे खेत में पड़ी मिली हैं। लगता है ये तुम्हारी ही होंगी। तुम इन्हें रख लो।"

किसान ने स्वर्ण मुद्राओं की ओर देखा और मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।

"नहीं सेठ जी, ये मेरी नहीं हैं।"

राजा ने आश्चर्य से पूछा,
"तुम्हें कैसे पता कि ये तुम्हारी नहीं हैं?"

किसान बोला,
"क्योंकि मैंने इन्हें कमाया नहीं है। आप इन्हें अपने पास रखिए या किसी जरूरतमंद को दे दीजिए।"

राजा को यह बात कुछ अजीब लगी।

उसने कहा,
"भाई, धन को कौन ठुकराता है? धन से जीवन आसान होता है। तुम इन्हें रख लो। तुम्हें इनकी ज़रूरत पड़ेगी।"

किसान हँस पड़ा।

"सेठ जी, मुझे जितना चाहिए, उतना मेरे पास है।"

राजा ने हैरानी से पूछा,
"और तुम्हें कितना चाहिए?"

किसान ने बड़े सहज भाव से कहा,

"मैं रोज़ चार आने कमाता हूँ और उन्हीं चार आने में खुशी-खुशी अपना जीवन चला लेता हूँ।"

राजा जैसे चौंक गया।

"सिर्फ चार आने?"

किसान ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

राजा ने पूछा,
"तुम इतने कम पैसों में भी खुश रहते हो?"

किसान ने अपनी थाली एक तरफ रखी और बोला,

"सेठ जी, खुशी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमारे पास कितना पैसा है। असली बात यह है कि हमारे पास जो पैसा है, उसका इस्तेमाल हम किस तरह करते हैं।"

राजा किसान की बात सुनकर सोच में पड़ गया।

उसने पूछा,

"अच्छा! तो तुम इन चार आने का करते क्या हो?"

किसान मुस्कुराया और बोला,

"एक आना कुएँ में डाल देता हूँ, दूसरा आना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ, तीसरा उधार दे देता हूँ और चौथा मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा का माथा घूम गया।

"क्या मतलब?"

लेकिन किसान मुस्कुराता हुआ अपने खेत की ओर चला गया।

राजा पीछे से उसे देखता रह गया।

उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—

"एक आना कुएँ में डालना, एक से कर्ज चुकाना, एक उधार देना और एक मिट्टी में गाड़ देना... आखिर इसका मतलब क्या है?"

उस दिन राजा वापस महल तो लौट आया, लेकिन किसान की बात उसके दिमाग से नहीं निकली।

अगली सुबह उसने तुरंत राजसभा बुलाई।

राजा ने दरबारियों को पूरी घटना सुनाई और पूछा,

"बताओ, उस किसान के चार आने का क्या रहस्य है?"

एक दरबारी बोला,
"महाराज, शायद वह कुएँ में सचमुच पैसा डालता होगा।"

दूसरा बोला,
"शायद वह किसी से लिया हुआ कर्ज चुकाता है।"

तीसरे ने कहा,
"संभव है वह किसी जरूरतमंद को पैसे उधार देता हो।"

चौथे ने कहा,
"और शायद वह सच में पैसे जमीन में गाड़ देता हो।"

राजा ने सबकी बातें सुनीं, लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि नहीं आई।

आखिर उसने आदेश दिया,

"उस किसान को ढूँढकर दरबार में लाया जाए।"

कई लोगों को भेजा गया। बहुत खोजबीन के बाद किसान मिल गया।

अगले दिन वह राजा के दरबार में उपस्थित हुआ।

राजा ने इस बार अपना भेष छोड़ दिया और किसान को बताया,

"जिस व्यक्ति से तुम कल मिले थे, वह कोई साधारण राहगीर नहीं, बल्कि तुम्हारा राजा था।"

किसान घबरा गया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

राजा ने मुस्कुराते हुए कहा,

"घबराओ मत। मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। बल्कि तुम्हारी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है।"

राजा ने किसान को अपने पास बैठाया और पूछा,

"कल तुमने कहा था कि तुम अपनी चार आने की कमाई को चार अलग-अलग जगह लगाते हो। मैं आज उसी रहस्य को जानना चाहता हूँ।"

किसान ने विनम्रता से कहा,

"महाराज, इसमें कोई बड़ा रहस्य नहीं है। बस मैंने अपने जीवन की कमाई को चार हिस्सों में बाँट रखा है।"

राजा ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।

किसान ने कहा,

"पहला आना मैं कुएँ में डाल देता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"इसका क्या अर्थ है?"

किसान बोला,

"महाराज, इसका अर्थ है कि मैं अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने परिवार के भरण-पोषण में लगाता हूँ। जैसे कुएँ में पानी डालने से वह पानी हमारे काम आता है, वैसे ही परिवार पर खर्च किया गया धन हमारे जीवन को संभालता है।"

राजा ने सिर हिलाया।

किसान आगे बोला,

"दूसरा आना मैं अपना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"किसका कर्ज?"

किसान मुस्कुराया।

"अपने माता-पिता का।"

राजा चुप हो गया।

किसान बोला,

"महाराज, मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया और जीवन जीना सिखाया। आज जब वे वृद्ध हो गए हैं तो उनकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। उनकी सेवा करके मैं अपने जीवन का वह कर्ज चुकाता हूँ, जिसे कभी पूरी तरह चुकाया नहीं जा सकता।"

दरबार में सन्नाटा छा गया।

किसान ने तीसरे आने की बात शुरू की।

"तीसरा आना मैं उधार दे देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"किसे?"

किसान ने कहा,

"अपने बच्चों को।"

राजा ध्यान से सुनता रहा।

"मैं अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अच्छे संस्कारों पर यह धन खर्च करता हूँ। आज मैं उन पर खर्च कर रहा हूँ, कल जब वे बड़े होंगे तो यही शिक्षा और संस्कार उनके जीवन में लौटकर आएँगे। इसलिए मैं इसे उधार देना कहता हूँ।"

राजा के चेहरे पर अब समझ की चमक दिखाई देने लगी।

फिर किसान ने कहा,

"और चौथा आना मैं मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"यानी बचत?"

किसान मुस्कुराया।

"जी महाराज। मैं अपनी कमाई का थोड़ा हिस्सा भविष्य के लिए बचाकर रखता हूँ। ताकि जब कभी कठिन समय आए तो मुझे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। और यदि आवश्यकता न पड़े तो उस धन का उपयोग किसी धार्मिक, सामाजिक या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता में कर सकूँ।"

राजा कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत बैठा रहा।

फिर उसने गहरी साँस ली।

उसे अचानक एहसास हुआ कि वह जिस शांति को वर्षों से महल, धन और विद्वानों के बीच खोज रहा था, उसका रास्ता तो इस साधारण किसान को पहले से मालूम था।

राजा ने किसान से कहा,

"आज तुमने मुझे वह बात सिखा दी, जो मेरे सारे विद्वान नहीं सिखा सके।"

किसान ने सिर झुकाकर कहा,

"महाराज, मैंने तो बस अपनी जिंदगी जीने का तरीका बताया है।"

राजा मुस्कुराया।

लेकिन उस दिन से राजा की सोच बदल गई।

अब वह केवल यह नहीं सोचता था कि उसके पास कितना धन है।

वह यह सोचने लगा कि-

"मेरे पास जो धन है, उसका सही उपयोग कितना है?"

उसने अपने जीवन में परिवार, माता-पिता, बच्चों, भविष्य और समाज के लिए धन का उचित हिस्सा निर्धारित करना शुरू किया।

धीरे-धीरे उसके मन की बेचैनी कम होने लगी।

उसे समझ आ गया कि धन अपने आप में खुशी नहीं देता। धन का सही उपयोग ही जीवन में संतोष ला सकता है।

रविवार, सितंबर 13

घड़े की कहानी

घड़े की कहानी

संतों की सभा और एक साधारण-सा घड़ा

एक शांत स्थान पर संतों की एक सभा लगी हुई थी। चारों ओर भक्ति, शांति और आध्यात्मिक वातावरण था। दूर-दूर से आए संत एकत्र होकर ईश्वर की चर्चा कर रहे थे। सभा के एक कोने में मिट्टी का एक साधारण-सा घड़ा रखा हुआ था। उस घड़े में निर्मल गंगाजल भरा गया था, ताकि प्यास लगने पर संतजन उसमें से जल ग्रहण कर सकें।

सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देखने लगा। कुछ देर बाद उसके मन में विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। वह सोचने लगा, "कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न जाने कितने घड़ों में पानी भरा होगा, लेकिन इसे तो गंगाजल रखने का सौभाग्य मिला है। ऊपर से संतों की सेवा का अवसर भी! संत इसे छुएंगे, इससे जल ग्रहण करेंगे... सचमुच इसकी किस्मत तो बहुत अच्छी है।"

जब घड़े ने अपनी कहानी सुनाई

वह व्यक्ति अभी इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि अचानक उसे लगा जैसे घड़ा उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहा है। तभी एक धीमी-सी आवाज सुनाई दी, "बंधु, क्या सच में तुम्हें लगता है कि मैं भाग्यशाली पैदा हुआ था?" वह व्यक्ति चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन आसपास कोई नहीं था। फिर घड़े की आवाज आई, "तुम्हें मेरी आज की स्थिति दिखाई दे रही है, लेकिन मेरी पूरी कहानी नहीं। अगर सुनना चाहते हो, तो मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं।"

घड़ा जैसे वर्षों पुरानी यादों में खो गया और बोला, "एक समय था जब मैं सिर्फ मिट्टी था। जमीन के अंदर पड़ा हुआ, बिल्कुल साधारण और किसी काम का नहीं। न मेरी कोई पहचान थी और न कोई ऐसा उद्देश्य, जिससे मुझे लगता कि मेरा जीवन सार्थक है। फिर एक दिन एक कुम्हार वहां आया। उसने फावड़ा उठाया और मुझे खोदना शुरू कर दिया। फावड़े की हर चोट मुझे दर्द देती थी। मैं सोचता था कि आखिर मैंने ऐसा क्या अपराध किया है, जो मेरे ऊपर इतनी चोटें की जा रही हैं? मुझे क्या पता था कि वही चोटें मेरे नए जीवन की पहली सीढ़ी हैं।"

मिट्टी से घड़ा बनने की कठिन यात्रा

घड़ा आगे बोला, "कुम्हार मुझे गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां पहुंचते ही उसने मुझे पैरों से रौंदना शुरू कर दिया। फिर मेरे अंदर पानी डाला, मुझे बार-बार गूंथा और मेरी पुरानी अवस्था को पूरी तरह बदलने लगा। मैं भीतर से टूटता जा रहा था और मन ही मन भगवान से शिकायत करता था कि पहले फावड़े की चोटें और अब पैरों से कुचलना... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?" लेकिन कुम्हार रुका नहीं। उसने मुझे चाक पर चढ़ा दिया। चाक तेजी से घूमने लगा और कुम्हार कभी मुझे दबाता, कभी खींचता और कभी थपथपाकर आकार देता। कभी मैं इधर झुकता तो कभी उधर। मुझे लग रहा था कि मेरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। मैं सोचता था कि शायद भगवान ने मेरे लिए केवल कष्ट ही लिखे हैं।

लेकिन मेरी परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे उठाया और भट्ठी के अंदर डाल दिया। चारों ओर आग थी और भीषण गर्मी से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उस समय मैंने पहली बार भगवान से शिकायत की। मैंने मन ही मन कहा, "हे प्रभु! आखिर मेरी गलती क्या है? पहले खोदा, फिर कुचला, फिर चाक पर घुमाया और अब आग में जला रहे हो। अगर आप सच में हैं, तो मुझे बचाते क्यों नहीं?" लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आग बढ़ती गई और मैं तपता रहा।


जिसे मैं सजा समझ रहा था, वह मेरी तैयारी थी

आखिर एक दिन भट्ठी का दरवाजा खुला और मैं बाहर आया। मैं वही मिट्टी नहीं था, जो कभी जमीन के अंदर पड़ी रहती थी। अब मैं एक घड़ा बन चुका था। लेकिन मेरी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे गधे पर लादा और बाजार में ले गया। वहां लोग मुझे उठाकर देखते, घुमाते और ठोक-ठोककर जांचते कि मैं ठीक हूं या नहीं। हर ठोकर मुझे फिर चोट जैसी लगती थी। मैं सोचता था कि इतना सब सहने के बाद भी लोग मुझे क्यों परख रहे हैं? और जब आखिरकार मेरी कीमत लगाई गई, तो वह भी केवल 20-30 रुपये! उस समय मैं अंदर से पूरी तरह टूट गया। मैंने आसमान की ओर देखकर कहा, "हे भगवान! मेरी इतनी सारी पीड़ा की कीमत बस इतनी सी है?"

फिर मेरी जिंदगी बदल गई

घड़ा कुछ क्षण के लिए शांत हुआ और फिर बोला, "लेकिन मेरी असली कहानी तो इसके बाद शुरू हुई। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और अपने घर ले गए। मुझे लगा था कि शायद अब मुझे किसी कोने में रख दिया जाएगा। लेकिन उन्होंने मेरे अंदर गंगाजल भरा और मुझे संतों की इस सभा में ले आए। आज मैं यहां रखा हूं। संत मेरे पास आते हैं, मेरे अंदर भरे गंगाजल को ग्रहण करते हैं और लोग मुझे देखकर कहते हैं कि मैं कितना भाग्यशाली हूं।"

घड़े ने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, "लेकिन आज मुझे अपनी पूरी कहानी समझ में आती है। अगर उस दिन कुम्हार ने मुझे फावड़े से नहीं खोदा होता तो मैं मिट्टी ही पड़ा रहता। अगर उसने मुझे पैरों से नहीं रौंदा होता तो मैं कभी आकार नहीं ले पाता। अगर उसने मुझे चाक पर नहीं घुमाया होता तो मैं घड़ा नहीं बनता। अगर उसने मुझे आग में नहीं तपाया होता तो मैं मजबूत नहीं बनता। और अगर बाजार में लोगों ने मुझे ठोककर नहीं परखा होता तो मेरी मजबूती का पता कैसे चलता?"

फिर घड़े ने कहा, "जिसे मैं उस समय भगवान का अन्याय समझ रहा था, आज वही उनकी सबसे बड़ी कृपा दिखाई दे रही है। उस समय मुझे केवल दर्द दिखाई देता था, अपना भविष्य नहीं। इसलिए हर चोट मुझे सजा लगती थी। आज समझ आया कि भगवान मुझे तोड़ नहीं रहे थे, बल्कि मुझे उस योग्य बना रहे थे, जिसके लिए मेरा जन्म हुआ था।"

हमारी जिंदगी भी उस घड़े जैसी है

घड़े की कहानी सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर तक शांत बैठा रहा। उसके मन में जैसे कई सवालों के जवाब मिल गए थे। सच तो यह है कि हमारी जिंदगी भी उस घड़े से अलग नहीं है। कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते। कभी मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलती, कभी कोई रास्ता अचानक बंद हो जाता है, कभी अपने ही लोग साथ छोड़ देते हैं और कभी ऐसा लगता है कि हमने भगवान से इतनी प्रार्थनाएं कीं, इतने प्रयास किए, फिर भी हमारी सुनवाई क्यों नहीं हो रही।

ऐसे समय में हम भी उस मिट्टी की तरह सोचने लगते हैं, "आखिर मेरे साथ ही क्यों?" लेकिन समस्या यह है कि हमें केवल वर्तमान दिखाई देता है, भविष्य नहीं। हमें दर्द दिखाई देता है, उसके पीछे छिपा उद्देश्य नहीं दिखाई देता। हमें बंद दरवाजा दिखाई देता है, लेकिन यह नहीं पता होता कि शायद उसी दरवाजे के पीछे हमारे लिए कोई बेहतर रास्ता तैयार हो रहा है।

हर कठिनाई का एक उद्देश्य हो सकता है

कुम्हार मिट्टी को इसलिए नहीं रौंदता कि वह उससे नफरत करता है। वह मिट्टी को इसलिए गूंथता और आकार देता है क्योंकि वह जानता है कि बिना उस प्रक्रिया के एक सुंदर और मजबूत घड़ा तैयार नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जीवन की हर कठिन परिस्थिति हमेशा सजा नहीं होती। कई बार वह हमारे व्यक्तित्व को मजबूत करने, हमारी सोच को बदलने और हमें किसी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य बनाने की तैयारी होती है।

जिस तरह मिट्टी को यह पता नहीं होता कि वह एक दिन घड़ा बनेगी, उसी तरह इंसान को भी अक्सर यह पता नहीं होता कि उसकी आज की परेशानी उसके कल की पहचान बनने वाली है। इसलिए जब जीवन आपको चाक पर घुमाए, परिस्थितियां आपको रौंदें, समय आपको आग में तपाए और लोग आपको ठोक-ठोककर परखें, तो तुरंत यह मत मान लेना कि भगवान ने आपको छोड़ दिया है। हो सकता है, आपके जीवन का सबसे सुंदर रूप अभी बन ही रहा हो।


परीक्षा के समय विश्वास मत खोइए

जीवन की कठिन परीक्षा के दौरान सबसे जरूरी है कि हम सत्य और न्याय का रास्ता न छोड़ें। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने संस्कार, ईमानदारी और विश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। ईश्वर की कृपा किसी के जीवन में जल्दी दिखाई देती है तो किसी के जीवन में देर से, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर ने किसी को भुला दिया है।

कई बार हमें लगता है कि हमारी प्रार्थनाएं स्वीकार नहीं हो रहीं, लेकिन संभव है कि ईश्वर हमारी इच्छा पूरी करने से पहले हमें उसके योग्य बना रहे हों। आखिर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपता जिसे गाड़ी चलाना ही न आता हो। उसी तरह ईश्वर भी अपनी बड़ी कृपा और बड़ी जिम्मेदारियां उसी व्यक्ति को सौंपते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रख सके और सही रास्ते पर टिक सके।

अंत में बस इतना याद रखिए

जब भी जीवन में कोई कठिन दौर आए, तो एक बार उस घड़े को जरूर याद कीजिए। याद रखिए कि फावड़े की चोट, पैरों से कुचला जाना, चाक पर घूमना, आग में तपना और बाजार में ठोकरें खाना, इनमें से कोई भी घटना उस घड़े को नष्ट करने के लिए नहीं थी। हर कष्ट उसे उसके वास्तविक रूप तक पहुंचाने की तैयारी था।

हो सकता है आज आप भी अपनी जिंदगी के किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हों और आपको समझ नहीं आ रहा हो कि आपके साथ ही इतना कुछ क्यों हो रहा है। लेकिन शायद आपकी कहानी भी अभी अधूरी है। शायद जो कुछ आज आपको अन्याय लग रहा है, वही कल आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाए।

इसलिए परिस्थितियों से घबराइए मत, ईश्वर पर विश्वास रखिए और सत्य के रास्ते से कभी मत हटिए।

क्योंकि हो सकता है-

"जिस दर्द को आप आज अपनी सजा समझ रहे हैं, वही कल आपकी सबसे बड़ी कृपा की वजह बन जाए।"

और याद रखिए, मिट्टी को जब तक आग में नहीं तपाया जाता, तब तक वह घड़ा नहीं बनती। उसी तरह इंसान भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर ही अपने वास्तविक सामर्थ्य को पहचानता है।

गुरुवार, जून 18

राम नाम का चमत्कार

राम नाम का चमत्कार

एक बार एक गांव में एक साधु रहता था, सारा दिन राम-राम जपता रहता और ढोलकी बजाकर कीर्तन करता रहता| उसकी कुटिया के पास जिस व्यक्ति का घर था, वह उससे बहुत परेशान था|  एक दिन वह व्यक्ति गुस्से में उस साधु की कुटिया में चला गया और कहने लगा कि तुम क्या दिन-रात राम-राम रटते रहते हो? तुम्हें तो कोई काम धंधा नहीं है, हमें तो कमाने जाना पड़ता है, तुम्हारी ढोलकी की आवाज से मैं सो नहीं पाता.

साधु कहने लगा - "तुम भी मेरे साथ राम-राम जप के देखो तब तुम्हें पता चलेगा कितना आनंद आता है|" उस व्यक्ति ने थोड़ा खींझकर कहा,"अगर मैं तुम्हारे साथ राम-राम जपता हूं तो क्या तुम्हारा राम मुझे खाने के लिए रोटी देगा? साधु कहने लगा कि "मुझे तो राम नाम की लगन लगी है मुझे तो राम जी की कृपा से हर रोज भोजन मिल ही जाता है| तुम भी राम-राम जप के देख लो मुझे भरोसा है भगवान तुझे खाने को जरूर देगा|

वह आदमी उस साधु को चुनौती देता है कि मैं तुम्हारे साथ आज राम-राम का भजन करता हूं, अगर तुम्हारे राम ने आज मुझे रोटी खिला दी तो सारी उम्र राम की भक्ति में लगा दूंगा| अगर नहीं खिलाई तो तुम ढोलकी बजाना बंद कर दोगे| साधू कहता है कि मैंने तो निष्काम भाव से प्रभु राम की भक्ति की है लेकिन फिर भी मुझे तुम्हारी चुनौती मंजूर है| 

वह व्यक्ति साधु के साथ बैठकर राम-राम का जाप करता है और मन में निश्चय करता है कि चाहे कुछ हो जाए मैं आज भोजन नहीं करूँगा, देखता हूँ इसका राम मुझे कैसे भोजन कराता है| राम-राम का भजन करने के बाद वह सोचता है कि अगर अब मैं घर जाता हूं तो मेरी मां और बीवी मुझे खाने को कहेंगे और मुझे रोटी खानी पड़ सकती है| लेकिन मुझे साधु को चुनौती में हराना है इसलिए वह घर जाने की बजाए गांव के पास के जंगल में चला जाता है|

जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर बैठ जाता है, वह सोचता है कि मैं सारा दिन इस पेड़ से उतरूंगा ही नहीं, अन्न का दाना भी नहीं खाऊंगा, इस तरह मैं साधु को हरा दूंगा और उसका ढोलकी बजाना बंद हो जाएगा|

कुछ देर बाद उस जंगल से एक बंजारों की टोली गुजरती है|

उन्हें भूख लगी होती है तो बंजारों का सरदार कहता है कि आग जलाकर यहीं पर खाना बना लो, अब खाना खाकर ही आगे बढ़ेंगे, खाना बन कर तैयार हो जाता है| बंजारे खाना खाने ही वाले होते हैं, कि इतनी देर में बंजारों को सूचना मिलती है कि पीछे से डाकू आ रहे हैं तो बंजारों का सरदार कहता है कि हमें यहां से चले जाना चाहिए|

डाकू हमारा सब कुछ लूट सकते हैं, वे बंजारे खाना वही पर छोड़ कर चले जाते हैं, वह आदमी पेड़ पर चढा़ सब कुछ देख रहा था| कुछ समय बाद डाकू वहां पहुंच जाते हैं, भोजन को देखकर डाकू कहते हैं कि खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है, लेकिन यह भोजन किसने बनाया? बनाने के बाद खाया क्यों नहीं? कहीं किसी की चाल तो नहीं हमें फसाने की? हो सकता है इस भोजन में जहर हो| 

उसी समय डाकुओं के सरदार की नजर उस व्यक्ति पर पड़ी, वह उसे नीचे आने का आदेश देता है| डाकू उस व्यक्ति से पूछते हैं,"हमें मारने के लिए, क्या भोजन तुमने बनाया है?

वह बेचारा मिन्नते करता रहता है कि मैंने यह भोजन नहीं बनाया, इसमें जहर नहीं है|

यह भोजन बंजारों ने बनाया है आपके आने की खबर सुनकर वह जहां से भाग गए, लेकिन डाकूओं के आगे उसकी एक नहीं चली| डाकू उससे कहते हैं कि अब तुम्हें यह भोजन खा कर दिखाना पड़ेगा, क्योंकि हमें लगता है कि तुमने ही यह भोजन बनाया है और इसमें जहर मिलाया?

अब तुम ही सबसे पहले यह भोजन खाओगे, वह जिद्द पर अड़ा रहता है मैं यह भोजन नहीं खाऊंगा, किसी कीमत पर नहीं खाऊंगा| डाकूओं का शक ओर गहरा हो जाता है, वे बंदूक की नोक उसके सिर पर रखकर कहते हैं तुझे यह भोजन खाना पड़ेगा, नहीं तो गोली खानी पड़ेगी|

वह व्यक्ति भोजन कर रहा था और साधु को याद करते करते आंसू उसकी आँखों से बह रहे थे|

उसने कहा था कि मेरा निश्चय है कि राम नाम जप लेगा तो राम तुझे भोजन भी देंगे, उसके भोजन करने के बाद डाकूओं ने उसे छोड़ दिया| अब उसे विश्वास हो गया कि बंजारों को और डाकूओं को राम जी ने ही भेजा है| वह सीधा साधू की कुटिया में चला गया और जा कर उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सारा वृतांत सुनाया|

अब उस साधु से भी ज्यादा उसे राम नाम की लगन लग गई, उसने अपना पूरा जीवन राम जी को समर्पित कर दिया..!!

सोमवार, जून 15

जब तक दीपक जलता है

जब तक दीपक जलता है

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक युवक रहता था। उसका परिवार बेहद साधारण था। पिता लकड़ियाँ काटकर घर चलाते थे और माँ गाँव के लोगों के कपड़े सिलती थीं। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए रात को मिट्टी के दीपक की रोशनी में ही काम होता था। मोहन बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था। वह अक्सर गाँव के बाहर पहाड़ी पर बैठकर दूर शहर की चमकती रोशनियों को देखा करता था। उसे लगता था कि उन रोशनियों के पीछे कोई ऐसी दुनिया है जहाँ सपने सच होते हैं। लेकिन गाँव के लोग उसकी बातों पर हँसते थे। वे कहते, "मोहन, बड़े सपने देखने से कुछ नहीं होता। गरीब आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए।" मोहन उनकी बातें सुनता जरूर था, लेकिन अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने देता था।

एक छोटी-सी सीख

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उन्होंने लोगों को जीवन के बारे में कई बातें बताईं। जब सभा समाप्त हुई तो मोहन उनके पास गया और बोला, "महाराज, मैं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास न साधन हैं और न ही अवसर। मैं क्या करूँ?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "बेटा, रात का अंधेरा कभी सूरज को रोक नहीं सकता। लेकिन सूरज बनने के लिए पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

मोहन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन उसने इसे अपने दिल में बसा लिया।

संघर्ष का दौर

कुछ वर्षों बाद पिता की तबीयत खराब हो गई। घर की जिम्मेदारी मोहन के कंधों पर आ गई। अब उसे दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी पड़ती थीं। शाम को थका हुआ शरीर जवाब दे देता, लेकिन वह फिर भी किताबें लेकर बैठ जाता। कई बार उसकी आँखें नींद से बंद होने लगतीं, फिर भी वह खुद को जगाकर पढ़ाई करता। उसे विश्वास था कि मेहनत का फल एक दिन जरूर मिलेगा। गाँव के कई लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन मोहन ने हार नहीं मानी।

पहली असफलता

एक दिन उसे शहर जाकर एक बड़ी छात्रवृत्ति परीक्षा देने का मौका मिला। उसने महीनों तैयारी की थी। परीक्षा हुई और वह पूरे विश्वास के साथ घर लौटा। लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था। मोहन टूट गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई हो। कई दिनों तक उसने किताबों को हाथ तक नहीं लगाया। उसे लगने लगा कि शायद गाँव वालों की बात सही थी। शायद बड़े सपने सिर्फ अमीर लोगों के लिए होते हैं।

दीपक की याद

एक रात वह उदास होकर घर के बाहर बैठा था। सामने रखा दीपक तेज हवा में भी जल रहा था।

उसे अचानक साधु की बात याद आई - "सूरज बनने से पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

उसने महसूस किया कि एक असफलता उसकी मंजिल नहीं छीन सकती। उस रात उसने फैसला किया कि वह दोबारा प्रयास करेगा।

नया सफर

मोहन अगले दिन शहर चला गया। उसने एक पुस्तकालय में सहायक का काम शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन वहाँ उसे हजारों किताबों तक पहुँच मिल गई। दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। उसने अपने हर खाली मिनट का उपयोग सीखने में किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब वह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए पढ़ रहा था।

बड़ा अवसर

एक वर्ष बाद राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें पूरे प्रदेश के हजारों छात्र भाग लेने वाले थे। मोहन ने भी आवेदन कर दिया। प्रतियोगिता कठिन थी। कई प्रतिभागी बड़े शहरों और प्रतिष्ठित स्कूलों से आए थे।

पहले दिन ही मोहन घबरा गया।

उसे लगा कि वह इन लोगों के सामने टिक नहीं पाएगा।

लेकिन तभी उसने खुद से कहा, "अगर मैं अपनी तुलना दूसरों से करूँगा तो हमेशा कमजोर महसूस करूँगा। मुझे सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।"

यही सोचकर उसने पूरी मेहनत से प्रतियोगिता में भाग लिया।

सफलता का क्षण

कुछ हफ्तों बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र का नाम था - मोहन।

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक छोटे गाँव का लड़का इतनी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। जब यह खबर गाँव पहुँची तो वही लोग, जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। लेकिन मोहन के चेहरे पर घमंड नहीं था। उसे पता था कि यह सफलता सिर्फ एक पड़ाव है।

गाँव के लिए कुछ करने का संकल्प

सफलता मिलने के बाद मोहन ने शहर में ही बसने का निर्णय नहीं लिया। वह अपने गाँव वापस लौटा। उसने देखा कि गाँव के बच्चे आज भी वही कठिनाइयाँ झेल रहे हैं जो उसने झेली थीं। इसलिए उसने गाँव में एक छोटा-सा पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शुरू किया।

शुरुआत में केवल कुछ बच्चे आए। लेकिन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के विद्यार्थी वहाँ पढ़ने आने लगे। मोहन उन्हें सिर्फ किताबें नहीं देता था, बल्कि आत्मविश्वास भी देता था।

जब दीपक सूरज बन गया

कई वर्षों बाद वही गाँव शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

जहाँ पहले लोग बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते थे, अब उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

एक दिन एक छात्र ने मोहन से पूछा, "सर, आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी अंधेरे को कोसा नहीं। मैंने बस अपना दीपक जलाए रखा।"

शिक्षा

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य पर विश्वास रखते हैं और लगातार प्रयास करते रहते हैं, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमती है। असफलता रास्ता रोकने नहीं, बल्कि आपको और मजबूत बनाने के लिए आती है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपना दीपक जलाए रखता है, वही एक दिन सूरज बनकर चमकता है।

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

बुधवार, जून 10

भक्त और भगवान का संबंध

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एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे। वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 

एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे।

संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले। - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया

भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ, सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडू साथ,