रविवार, सितंबर 13

घड़े की कहानी

घड़े की कहानी

संतों की सभा और एक साधारण-सा घड़ा

एक शांत स्थान पर संतों की एक सभा लगी हुई थी। चारों ओर भक्ति, शांति और आध्यात्मिक वातावरण था। दूर-दूर से आए संत एकत्र होकर ईश्वर की चर्चा कर रहे थे। सभा के एक कोने में मिट्टी का एक साधारण-सा घड़ा रखा हुआ था। उस घड़े में निर्मल गंगाजल भरा गया था, ताकि प्यास लगने पर संतजन उसमें से जल ग्रहण कर सकें।

सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देखने लगा। कुछ देर बाद उसके मन में विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। वह सोचने लगा, "कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न जाने कितने घड़ों में पानी भरा होगा, लेकिन इसे तो गंगाजल रखने का सौभाग्य मिला है। ऊपर से संतों की सेवा का अवसर भी! संत इसे छुएंगे, इससे जल ग्रहण करेंगे... सचमुच इसकी किस्मत तो बहुत अच्छी है।"

जब घड़े ने अपनी कहानी सुनाई

वह व्यक्ति अभी इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि अचानक उसे लगा जैसे घड़ा उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहा है। तभी एक धीमी-सी आवाज सुनाई दी, "बंधु, क्या सच में तुम्हें लगता है कि मैं भाग्यशाली पैदा हुआ था?" वह व्यक्ति चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन आसपास कोई नहीं था। फिर घड़े की आवाज आई, "तुम्हें मेरी आज की स्थिति दिखाई दे रही है, लेकिन मेरी पूरी कहानी नहीं। अगर सुनना चाहते हो, तो मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं।"

घड़ा जैसे वर्षों पुरानी यादों में खो गया और बोला, "एक समय था जब मैं सिर्फ मिट्टी था। जमीन के अंदर पड़ा हुआ, बिल्कुल साधारण और किसी काम का नहीं। न मेरी कोई पहचान थी और न कोई ऐसा उद्देश्य, जिससे मुझे लगता कि मेरा जीवन सार्थक है। फिर एक दिन एक कुम्हार वहां आया। उसने फावड़ा उठाया और मुझे खोदना शुरू कर दिया। फावड़े की हर चोट मुझे दर्द देती थी। मैं सोचता था कि आखिर मैंने ऐसा क्या अपराध किया है, जो मेरे ऊपर इतनी चोटें की जा रही हैं? मुझे क्या पता था कि वही चोटें मेरे नए जीवन की पहली सीढ़ी हैं।"

मिट्टी से घड़ा बनने की कठिन यात्रा

घड़ा आगे बोला, "कुम्हार मुझे गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां पहुंचते ही उसने मुझे पैरों से रौंदना शुरू कर दिया। फिर मेरे अंदर पानी डाला, मुझे बार-बार गूंथा और मेरी पुरानी अवस्था को पूरी तरह बदलने लगा। मैं भीतर से टूटता जा रहा था और मन ही मन भगवान से शिकायत करता था कि पहले फावड़े की चोटें और अब पैरों से कुचलना... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?" लेकिन कुम्हार रुका नहीं। उसने मुझे चाक पर चढ़ा दिया। चाक तेजी से घूमने लगा और कुम्हार कभी मुझे दबाता, कभी खींचता और कभी थपथपाकर आकार देता। कभी मैं इधर झुकता तो कभी उधर। मुझे लग रहा था कि मेरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। मैं सोचता था कि शायद भगवान ने मेरे लिए केवल कष्ट ही लिखे हैं।

लेकिन मेरी परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे उठाया और भट्ठी के अंदर डाल दिया। चारों ओर आग थी और भीषण गर्मी से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उस समय मैंने पहली बार भगवान से शिकायत की। मैंने मन ही मन कहा, "हे प्रभु! आखिर मेरी गलती क्या है? पहले खोदा, फिर कुचला, फिर चाक पर घुमाया और अब आग में जला रहे हो। अगर आप सच में हैं, तो मुझे बचाते क्यों नहीं?" लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आग बढ़ती गई और मैं तपता रहा।

जिसे मैं सजा समझ रहा था, वह मेरी तैयारी थी

आखिर एक दिन भट्ठी का दरवाजा खुला और मैं बाहर आया। मैं वही मिट्टी नहीं था, जो कभी जमीन के अंदर पड़ी रहती थी। अब मैं एक घड़ा बन चुका था। लेकिन मेरी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे गधे पर लादा और बाजार में ले गया। वहां लोग मुझे उठाकर देखते, घुमाते और ठोक-ठोककर जांचते कि मैं ठीक हूं या नहीं। हर ठोकर मुझे फिर चोट जैसी लगती थी। मैं सोचता था कि इतना सब सहने के बाद भी लोग मुझे क्यों परख रहे हैं? और जब आखिरकार मेरी कीमत लगाई गई, तो वह भी केवल 20-30 रुपये! उस समय मैं अंदर से पूरी तरह टूट गया। मैंने आसमान की ओर देखकर कहा, "हे भगवान! मेरी इतनी सारी पीड़ा की कीमत बस इतनी सी है?"

फिर मेरी जिंदगी बदल गई

घड़ा कुछ क्षण के लिए शांत हुआ और फिर बोला, "लेकिन मेरी असली कहानी तो इसके बाद शुरू हुई। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और अपने घर ले गए। मुझे लगा था कि शायद अब मुझे किसी कोने में रख दिया जाएगा। लेकिन उन्होंने मेरे अंदर गंगाजल भरा और मुझे संतों की इस सभा में ले आए। आज मैं यहां रखा हूं। संत मेरे पास आते हैं, मेरे अंदर भरे गंगाजल को ग्रहण करते हैं और लोग मुझे देखकर कहते हैं कि मैं कितना भाग्यशाली हूं।"

घड़े ने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, "लेकिन आज मुझे अपनी पूरी कहानी समझ में आती है। अगर उस दिन कुम्हार ने मुझे फावड़े से नहीं खोदा होता तो मैं मिट्टी ही पड़ा रहता। अगर उसने मुझे पैरों से नहीं रौंदा होता तो मैं कभी आकार नहीं ले पाता। अगर उसने मुझे चाक पर नहीं घुमाया होता तो मैं घड़ा नहीं बनता। अगर उसने मुझे आग में नहीं तपाया होता तो मैं मजबूत नहीं बनता। और अगर बाजार में लोगों ने मुझे ठोककर नहीं परखा होता तो मेरी मजबूती का पता कैसे चलता?"

फिर घड़े ने कहा, "जिसे मैं उस समय भगवान का अन्याय समझ रहा था, आज वही उनकी सबसे बड़ी कृपा दिखाई दे रही है। उस समय मुझे केवल दर्द दिखाई देता था, अपना भविष्य नहीं। इसलिए हर चोट मुझे सजा लगती थी। आज समझ आया कि भगवान मुझे तोड़ नहीं रहे थे, बल्कि मुझे उस योग्य बना रहे थे, जिसके लिए मेरा जन्म हुआ था।"

हमारी जिंदगी भी उस घड़े जैसी है

घड़े की कहानी सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर तक शांत बैठा रहा। उसके मन में जैसे कई सवालों के जवाब मिल गए थे। सच तो यह है कि हमारी जिंदगी भी उस घड़े से अलग नहीं है। कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते। कभी मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलती, कभी कोई रास्ता अचानक बंद हो जाता है, कभी अपने ही लोग साथ छोड़ देते हैं और कभी ऐसा लगता है कि हमने भगवान से इतनी प्रार्थनाएं कीं, इतने प्रयास किए, फिर भी हमारी सुनवाई क्यों नहीं हो रही।

ऐसे समय में हम भी उस मिट्टी की तरह सोचने लगते हैं, "आखिर मेरे साथ ही क्यों?" लेकिन समस्या यह है कि हमें केवल वर्तमान दिखाई देता है, भविष्य नहीं। हमें दर्द दिखाई देता है, उसके पीछे छिपा उद्देश्य नहीं दिखाई देता। हमें बंद दरवाजा दिखाई देता है, लेकिन यह नहीं पता होता कि शायद उसी दरवाजे के पीछे हमारे लिए कोई बेहतर रास्ता तैयार हो रहा है।

हर कठिनाई का एक उद्देश्य हो सकता है

कुम्हार मिट्टी को इसलिए नहीं रौंदता कि वह उससे नफरत करता है। वह मिट्टी को इसलिए गूंथता और आकार देता है क्योंकि वह जानता है कि बिना उस प्रक्रिया के एक सुंदर और मजबूत घड़ा तैयार नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जीवन की हर कठिन परिस्थिति हमेशा सजा नहीं होती। कई बार वह हमारे व्यक्तित्व को मजबूत करने, हमारी सोच को बदलने और हमें किसी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य बनाने की तैयारी होती है।

जिस तरह मिट्टी को यह पता नहीं होता कि वह एक दिन घड़ा बनेगी, उसी तरह इंसान को भी अक्सर यह पता नहीं होता कि उसकी आज की परेशानी उसके कल की पहचान बनने वाली है। इसलिए जब जीवन आपको चाक पर घुमाए, परिस्थितियां आपको रौंदें, समय आपको आग में तपाए और लोग आपको ठोक-ठोककर परखें, तो तुरंत यह मत मान लेना कि भगवान ने आपको छोड़ दिया है। हो सकता है, आपके जीवन का सबसे सुंदर रूप अभी बन ही रहा हो।

परीक्षा के समय विश्वास मत खोइए

जीवन की कठिन परीक्षा के दौरान सबसे जरूरी है कि हम सत्य और न्याय का रास्ता न छोड़ें। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने संस्कार, ईमानदारी और विश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। ईश्वर की कृपा किसी के जीवन में जल्दी दिखाई देती है तो किसी के जीवन में देर से, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर ने किसी को भुला दिया है।

कई बार हमें लगता है कि हमारी प्रार्थनाएं स्वीकार नहीं हो रहीं, लेकिन संभव है कि ईश्वर हमारी इच्छा पूरी करने से पहले हमें उसके योग्य बना रहे हों। आखिर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपता जिसे गाड़ी चलाना ही न आता हो। उसी तरह ईश्वर भी अपनी बड़ी कृपा और बड़ी जिम्मेदारियां उसी व्यक्ति को सौंपते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रख सके और सही रास्ते पर टिक सके।

अंत में बस इतना याद रखिए

जब भी जीवन में कोई कठिन दौर आए, तो एक बार उस घड़े को जरूर याद कीजिए। याद रखिए कि फावड़े की चोट, पैरों से कुचला जाना, चाक पर घूमना, आग में तपना और बाजार में ठोकरें खाना, इनमें से कोई भी घटना उस घड़े को नष्ट करने के लिए नहीं थी। हर कष्ट उसे उसके वास्तविक रूप तक पहुंचाने की तैयारी था।

हो सकता है आज आप भी अपनी जिंदगी के किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हों और आपको समझ नहीं आ रहा हो कि आपके साथ ही इतना कुछ क्यों हो रहा है। लेकिन शायद आपकी कहानी भी अभी अधूरी है। शायद जो कुछ आज आपको अन्याय लग रहा है, वही कल आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाए।

इसलिए परिस्थितियों से घबराइए मत, ईश्वर पर विश्वास रखिए और सत्य के रास्ते से कभी मत हटिए।

क्योंकि हो सकता है-

"जिस दर्द को आप आज अपनी सजा समझ रहे हैं, वही कल आपकी सबसे बड़ी कृपा की वजह बन जाए।"

और याद रखिए, मिट्टी को जब तक आग में नहीं तपाया जाता, तब तक वह घड़ा नहीं बनती। उसी तरह इंसान भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर ही अपने वास्तविक सामर्थ्य को पहचानता है।

गुरुवार, जून 18

राम नाम का चमत्कार

राम नाम का चमत्कार

एक बार एक गांव में एक साधु रहता था, सारा दिन राम-राम जपता रहता और ढोलकी बजाकर कीर्तन करता रहता| उसकी कुटिया के पास जिस व्यक्ति का घर था, वह उससे बहुत परेशान था|  एक दिन वह व्यक्ति गुस्से में उस साधु की कुटिया में चला गया और कहने लगा कि तुम क्या दिन-रात राम-राम रटते रहते हो? तुम्हें तो कोई काम धंधा नहीं है, हमें तो कमाने जाना पड़ता है, तुम्हारी ढोलकी की आवाज से मैं सो नहीं पाता.

साधु कहने लगा - "तुम भी मेरे साथ राम-राम जप के देखो तब तुम्हें पता चलेगा कितना आनंद आता है|" उस व्यक्ति ने थोड़ा खींझकर कहा,"अगर मैं तुम्हारे साथ राम-राम जपता हूं तो क्या तुम्हारा राम मुझे खाने के लिए रोटी देगा? साधु कहने लगा कि "मुझे तो राम नाम की लगन लगी है मुझे तो राम जी की कृपा से हर रोज भोजन मिल ही जाता है| तुम भी राम-राम जप के देख लो मुझे भरोसा है भगवान तुझे खाने को जरूर देगा|

वह आदमी उस साधु को चुनौती देता है कि मैं तुम्हारे साथ आज राम-राम का भजन करता हूं, अगर तुम्हारे राम ने आज मुझे रोटी खिला दी तो सारी उम्र राम की भक्ति में लगा दूंगा| अगर नहीं खिलाई तो तुम ढोलकी बजाना बंद कर दोगे| साधू कहता है कि मैंने तो निष्काम भाव से प्रभु राम की भक्ति की है लेकिन फिर भी मुझे तुम्हारी चुनौती मंजूर है| 

वह व्यक्ति साधु के साथ बैठकर राम-राम का जाप करता है और मन में निश्चय करता है कि चाहे कुछ हो जाए मैं आज भोजन नहीं करूँगा, देखता हूँ इसका राम मुझे कैसे भोजन कराता है| राम-राम का भजन करने के बाद वह सोचता है कि अगर अब मैं घर जाता हूं तो मेरी मां और बीवी मुझे खाने को कहेंगे और मुझे रोटी खानी पड़ सकती है| लेकिन मुझे साधु को चुनौती में हराना है इसलिए वह घर जाने की बजाए गांव के पास के जंगल में चला जाता है|

जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर बैठ जाता है, वह सोचता है कि मैं सारा दिन इस पेड़ से उतरूंगा ही नहीं, अन्न का दाना भी नहीं खाऊंगा, इस तरह मैं साधु को हरा दूंगा और उसका ढोलकी बजाना बंद हो जाएगा|

कुछ देर बाद उस जंगल से एक बंजारों की टोली गुजरती है|

उन्हें भूख लगी होती है तो बंजारों का सरदार कहता है कि आग जलाकर यहीं पर खाना बना लो, अब खाना खाकर ही आगे बढ़ेंगे, खाना बन कर तैयार हो जाता है| बंजारे खाना खाने ही वाले होते हैं, कि इतनी देर में बंजारों को सूचना मिलती है कि पीछे से डाकू आ रहे हैं तो बंजारों का सरदार कहता है कि हमें यहां से चले जाना चाहिए|

डाकू हमारा सब कुछ लूट सकते हैं, वे बंजारे खाना वही पर छोड़ कर चले जाते हैं, वह आदमी पेड़ पर चढा़ सब कुछ देख रहा था| कुछ समय बाद डाकू वहां पहुंच जाते हैं, भोजन को देखकर डाकू कहते हैं कि खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है, लेकिन यह भोजन किसने बनाया? बनाने के बाद खाया क्यों नहीं? कहीं किसी की चाल तो नहीं हमें फसाने की? हो सकता है इस भोजन में जहर हो| 

उसी समय डाकुओं के सरदार की नजर उस व्यक्ति पर पड़ी, वह उसे नीचे आने का आदेश देता है| डाकू उस व्यक्ति से पूछते हैं,"हमें मारने के लिए, क्या भोजन तुमने बनाया है?

वह बेचारा मिन्नते करता रहता है कि मैंने यह भोजन नहीं बनाया, इसमें जहर नहीं है|

यह भोजन बंजारों ने बनाया है आपके आने की खबर सुनकर वह जहां से भाग गए, लेकिन डाकूओं के आगे उसकी एक नहीं चली| डाकू उससे कहते हैं कि अब तुम्हें यह भोजन खा कर दिखाना पड़ेगा, क्योंकि हमें लगता है कि तुमने ही यह भोजन बनाया है और इसमें जहर मिलाया?

अब तुम ही सबसे पहले यह भोजन खाओगे, वह जिद्द पर अड़ा रहता है मैं यह भोजन नहीं खाऊंगा, किसी कीमत पर नहीं खाऊंगा| डाकूओं का शक ओर गहरा हो जाता है, वे बंदूक की नोक उसके सिर पर रखकर कहते हैं तुझे यह भोजन खाना पड़ेगा, नहीं तो गोली खानी पड़ेगी|

वह व्यक्ति भोजन कर रहा था और साधु को याद करते करते आंसू उसकी आँखों से बह रहे थे|

उसने कहा था कि मेरा निश्चय है कि राम नाम जप लेगा तो राम तुझे भोजन भी देंगे, उसके भोजन करने के बाद डाकूओं ने उसे छोड़ दिया| अब उसे विश्वास हो गया कि बंजारों को और डाकूओं को राम जी ने ही भेजा है| वह सीधा साधू की कुटिया में चला गया और जा कर उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सारा वृतांत सुनाया|

अब उस साधु से भी ज्यादा उसे राम नाम की लगन लग गई, उसने अपना पूरा जीवन राम जी को समर्पित कर दिया..!!

सोमवार, जून 15

जब तक दीपक जलता है

जब तक दीपक जलता है

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक युवक रहता था। उसका परिवार बेहद साधारण था। पिता लकड़ियाँ काटकर घर चलाते थे और माँ गाँव के लोगों के कपड़े सिलती थीं। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए रात को मिट्टी के दीपक की रोशनी में ही काम होता था। मोहन बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था। वह अक्सर गाँव के बाहर पहाड़ी पर बैठकर दूर शहर की चमकती रोशनियों को देखा करता था। उसे लगता था कि उन रोशनियों के पीछे कोई ऐसी दुनिया है जहाँ सपने सच होते हैं। लेकिन गाँव के लोग उसकी बातों पर हँसते थे। वे कहते, "मोहन, बड़े सपने देखने से कुछ नहीं होता। गरीब आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए।" मोहन उनकी बातें सुनता जरूर था, लेकिन अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने देता था।

एक छोटी-सी सीख

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उन्होंने लोगों को जीवन के बारे में कई बातें बताईं। जब सभा समाप्त हुई तो मोहन उनके पास गया और बोला, "महाराज, मैं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास न साधन हैं और न ही अवसर। मैं क्या करूँ?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "बेटा, रात का अंधेरा कभी सूरज को रोक नहीं सकता। लेकिन सूरज बनने के लिए पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

मोहन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन उसने इसे अपने दिल में बसा लिया।

संघर्ष का दौर

कुछ वर्षों बाद पिता की तबीयत खराब हो गई। घर की जिम्मेदारी मोहन के कंधों पर आ गई। अब उसे दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी पड़ती थीं। शाम को थका हुआ शरीर जवाब दे देता, लेकिन वह फिर भी किताबें लेकर बैठ जाता। कई बार उसकी आँखें नींद से बंद होने लगतीं, फिर भी वह खुद को जगाकर पढ़ाई करता। उसे विश्वास था कि मेहनत का फल एक दिन जरूर मिलेगा। गाँव के कई लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन मोहन ने हार नहीं मानी।

पहली असफलता

एक दिन उसे शहर जाकर एक बड़ी छात्रवृत्ति परीक्षा देने का मौका मिला। उसने महीनों तैयारी की थी। परीक्षा हुई और वह पूरे विश्वास के साथ घर लौटा। लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था। मोहन टूट गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई हो। कई दिनों तक उसने किताबों को हाथ तक नहीं लगाया। उसे लगने लगा कि शायद गाँव वालों की बात सही थी। शायद बड़े सपने सिर्फ अमीर लोगों के लिए होते हैं।

दीपक की याद

एक रात वह उदास होकर घर के बाहर बैठा था। सामने रखा दीपक तेज हवा में भी जल रहा था।

उसे अचानक साधु की बात याद आई - "सूरज बनने से पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

उसने महसूस किया कि एक असफलता उसकी मंजिल नहीं छीन सकती। उस रात उसने फैसला किया कि वह दोबारा प्रयास करेगा।

नया सफर

मोहन अगले दिन शहर चला गया। उसने एक पुस्तकालय में सहायक का काम शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन वहाँ उसे हजारों किताबों तक पहुँच मिल गई। दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। उसने अपने हर खाली मिनट का उपयोग सीखने में किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब वह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए पढ़ रहा था।

बड़ा अवसर

एक वर्ष बाद राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें पूरे प्रदेश के हजारों छात्र भाग लेने वाले थे। मोहन ने भी आवेदन कर दिया। प्रतियोगिता कठिन थी। कई प्रतिभागी बड़े शहरों और प्रतिष्ठित स्कूलों से आए थे।

पहले दिन ही मोहन घबरा गया।

उसे लगा कि वह इन लोगों के सामने टिक नहीं पाएगा।

लेकिन तभी उसने खुद से कहा, "अगर मैं अपनी तुलना दूसरों से करूँगा तो हमेशा कमजोर महसूस करूँगा। मुझे सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।"

यही सोचकर उसने पूरी मेहनत से प्रतियोगिता में भाग लिया।

सफलता का क्षण

कुछ हफ्तों बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र का नाम था - मोहन

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक छोटे गाँव का लड़का इतनी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। जब यह खबर गाँव पहुँची तो वही लोग, जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। लेकिन मोहन के चेहरे पर घमंड नहीं था। उसे पता था कि यह सफलता सिर्फ एक पड़ाव है।

गाँव के लिए कुछ करने का संकल्प

सफलता मिलने के बाद मोहन ने शहर में ही बसने का निर्णय नहीं लिया। वह अपने गाँव वापस लौटा। उसने देखा कि गाँव के बच्चे आज भी वही कठिनाइयाँ झेल रहे हैं जो उसने झेली थीं। इसलिए उसने गाँव में एक छोटा-सा पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शुरू किया।

शुरुआत में केवल कुछ बच्चे आए। लेकिन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के विद्यार्थी वहाँ पढ़ने आने लगे। मोहन उन्हें सिर्फ किताबें नहीं देता था, बल्कि आत्मविश्वास भी देता था।

जब दीपक सूरज बन गया

कई वर्षों बाद वही गाँव शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

जहाँ पहले लोग बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते थे, अब उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

एक दिन एक छात्र ने मोहन से पूछा, "सर, आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी अंधेरे को कोसा नहीं। मैंने बस अपना दीपक जलाए रखा।"

शिक्षा

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य पर विश्वास रखते हैं और लगातार प्रयास करते रहते हैं, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमती है। असफलता रास्ता रोकने नहीं, बल्कि आपको और मजबूत बनाने के लिए आती है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपना दीपक जलाए रखता है, वही एक दिन सूरज बनकर चमकता है।

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

बुधवार, जून 10

भक्त और भगवान का संबंध

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एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे। वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 

एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे।

संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले। - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया

भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ, सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडू साथ,

मंगलवार, जून 9

अंधेरे से उजाले तक

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गाँव रामपुर के एक गरीब किसान का बेटा अर्जुन, अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। उसके पास न पैसे थे, न संसाधन, लेकिन उसकी आँखों में एक सपना था, देश का सबसे बड़ा आईपीएस अफसर बनने का।

अर्जुन बचपन से ही होशियार था। दिन में खेतों में पिता का हाथ बँटाता और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता। उसके दोस्त अक्सर कहते, “अर्जुन, तू क्यों अपना सिर फोड़ रहा है? तेरे जैसे गरीब लड़के अफसर नहीं बनते।” लेकिन अर्जुन बस मुस्कुरा कर कहता, “मेरे सपनों की उड़ान, मेरी ज़मीन से नहीं, मेरे हौसले से तय होती है।”

संघर्ष की शुरुआत

एक दिन गाँव में सरकारी अधिकारी आए और किसानों की ज़मीन गलत दस्तावेज़ों के नाम पर ज़ब्त करने लगे। अर्जुन के पिता की ज़मीन भी खतरे में पड़ गई। अर्जुन ने विरोध किया, लेकिन पुलिस वालों ने उसे ग़लत तरीके से पकड़ कर जेल में डाल दिया।

जेल की सलाखों के पीछे अर्जुन ने फैसला किया - अब वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस गरीब के लिए लड़ेगा जिसे सिस्टम ने कुचला है।

एक नई शुरुआत

जेल से छूटने के बाद अर्जुन शहर चला गया। वहाँ वह एक चाय की दुकान पर काम करने लगा, ताकि अपने रहने और पढ़ाई का खर्च निकाल सके। दिनभर काम, रातभर पढ़ाई। कई बार भूखा सो गया, कई बार किताबों पर ही नींद आ गई। लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा।

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद वह UPSC परीक्षा में बैठा। जब रिजल्ट आया, अर्जुन AIR 7 पर था। पूरे गाँव ने पटाखे जलाए, लेकिन अर्जुन के चेहरे पर एक सन्नाटा था—क्योंकि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। वे बेटे की सफलता नहीं देख पाए।

आईपीएस अर्जुन राठौर की वापसी

अर्जुन की पहली पोस्टिंग उसी जिले में हुई जहाँ उसकी ज़मीन छीनी गई थी। अब वह एक अफसर था—आईपीएस अर्जुन राठौर। पहली ही मीटिंग में उसने उस भ्रष्ट अधिकारी को निलंबित किया जिसने उसके पिता को अपमानित किया था।

लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी।

ड्रामा और थ्रिल

रामपुर और उसके आसपास के इलाकों में एक बड़ा भू-माफिया सक्रिय था—नाम था विक्रम ठाकुर। वह राजनीतिक लोगों से मिला हुआ था, और पुलिस भी उससे डरती थी। अर्जुन ने जब अवैध कब्जे की फाइलें खोलीं, तो धमकियाँ आने लगीं।

एक रात अर्जुन की गाड़ी पर हमला हुआ। गोलियाँ चलीं, लेकिन वह बाल-बाल बचा। उसके साथी अफसरों ने कहा, “सर, ठाकुर से भिड़ना आसान नहीं है।” अर्जुन ने दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं भी रामपुर का बेटा हूँ। डरता नहीं, लड़ता हूँ।”

आखिरी मुठभेड़

अर्जुन ने एक रणनीति बनाई। उसने ठाकुर के आदमी को गिरफ्तार कर गुप्त जानकारी हासिल की। एक रात, पुलिस टीम के साथ अर्जुन ठाकुर के गोदाम पर छापा मारने पहुँचा। वहाँ भारी गोलीबारी हुई। धुएँ और अंधेरे के बीच अर्जुन ने खुद ठाकुर का पीछा किया। छत पर आमना-सामना हुआ।

ठाकुर बोला, “तू मुझे नहीं पकड़ सकता, मैं सिस्टम हूँ।”    

अर्जुन ने कहा, “सिस्टम अब बदल रहा है।”

एक जोरदार भिड़ंत के बाद, अर्जुन ने ठाकुर को गिरा दिया और हथकड़ी पहनाकर नीचे लाया।

अंत - उजाले की जीत

ठाकुर की गिरफ्तारी ने पूरे जिले में हलचल मचा दी। लोगों को पहली बार यकीन हुआ कि ईमानदारी और साहस से सिस्टम को बदला जा सकता है। अर्जुन ने न सिर्फ अपने पिता की ज़मीन वापस ली, बल्कि गाँव के हर किसान को न्याय दिलाया।

अर्जुन अब सिर्फ एक अफसर नहीं था - वह एक प्रेरणा बन चुका था।

सीख: जिंदगी में चाहे जितनी मुश्किलें आएं, अगर हौसला बुलंद हो और मकसद साफ हो, तो कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती। अंधेरे में डटे रहो, उजाला खुद रास्ता बना लेगा।

शनिवार, सितंबर 13

संघर्ष से सफलता तक

संघर्ष से सफलता तक

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में अजय नाम का लड़का रहता था। बचपन से ही उसके दिल में बड़े सपने थे। वह साधारण परिवार से था, लेकिन उसका सोच असाधारण थी। अजय हमेशा कहता,
“अगर हौसला बुलंद हो, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।”

चुनौती का निमंत्रण

एक दिन गाँव के पास पहाड़ों में रहने वाले साधुओं ने घोषणा की कि जो भी युवक उस कठिन पर्वत शिखर तक पहुँच जाएगा, उसे “वीर सम्मान” और अपने जीवन के लिए प्रेरणा का खजाना मिलेगा। यह पर्वत अब तक किसी ने नहीं चढ़ा था क्योंकि रास्ता खतरनाक और अज्ञात था। गाँव के कई लड़के पीछे हट गए। लेकिन अजय ने ठान लिया कि वह इस चुनौती को स्वीकार करेगा। उसके माता-पिता डर गए और बोले,

“बेटा, ये काम बहुत खतरनाक है।” अजय ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“माँ-पिता जी, खतरे से भागने वाले इतिहास नहीं बनाते। साहस करने वाले ही नया रास्ता दिखाते हैं।

सफ़र की शुरुआत

अजय ने केवल कुछ जरूरी सामान लिया – एक रस्सी, थोड़े अनाज, और पानी। सुबह सूरज निकलते ही उसने सफ़र शुरू किया।

रास्ते में घना जंगल आया। वहाँ अजय ने कई wild जानवरों की आवाज़ें सुनीं। अचानक एक बड़ा साँप उसके रास्ते में आ गया। अजय ने हिम्मत नहीं हारी। उसने पास पड़ी लंबी टहनी उठाई और साँप को धीरे-धीरे हटाकर आगे बढ़ा।

उसने खुद से कहा, “डर वही जीतता है, जिसे हम जीतने देते हैं। अगर मन मजबूत है तो हर समस्या का हल निकलता है।”

संघर्ष की रात

रात का समय था। अजय ने एक चट्टान के नीचे आराम करने की कोशिश की। लेकिन ठंडी हवाएँ और भूख ने उसे चैन से सोने नहीं दिया। पेट में दर्द हो रहा था, फिर भी उसने हार नहीं मानी। उसने तारों को देखते हुए सोचा,
“ये तारे मुझे याद दिलाते हैं कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, रोशनी की किरणें हमेशा मौजूद रहती हैं। मुझे भी आगे बढ़ना है।”

वह आधी रात तक जागता रहा, लेकिन सुबह होते ही नई ऊर्जा के साथ आगे निकल पड़ा।

दोस्त की मदद

जंगल पार करने के बाद अजय को नदी मिली। पानी का बहाव तेज था। वह सोच ही रहा था कि कैसे पार करे, तभी उसे पास में एक घायल हिरण दिखाई दिया। अजय ने सोचा – अगर मैं इस बेचारे की मदद नहीं करूंगा, तो मेरा साहस अधूरा रहेगा।

उसने बड़ी मेहनत से हिरण का घाव साफ़ किया और पत्तियों से पट्टी बाँधी। कुछ देर बाद हिरण धीरे-धीरे खड़ा हो गया। अजय खुश हुआ और बोला,
“सच्चा साहसी वही है, जो केवल अपनी नहीं, दूसरों की भी मदद करता है।”

हैरानी की बात यह हुई कि हिरण ने अजय को नदी पार करने का रास्ता दिखा दिया।

कठिन चढ़ाई

अब अजय पर्वत की तलहटी तक पहुँच चुका था। सामने खड़ी चट्टानों को देखकर वह घबरा गया। पत्थर फिसलन भरे थे, ऊपर घना कोहरा छाया था। लेकिन उसने अपने मन को समझाया,
“अगर लक्ष्य ऊँचा है तो रास्ता कठिन होगा ही। संघर्ष के बिना सफलता का स्वाद अधूरा है।

रस्सी की मदद से वह धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। कई बार उसके हाथ फिसले, कई बार वह गिरते-गिरते बचा। उसके घुटनों से खून भी निकल आया, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

मंज़िल का दृश्य

कई दिनों के संघर्ष के बाद आखिरकार अजय शिखर पर पहुँचा। वहाँ से पूरा गाँव, जंगल और नदी दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवाओं के बीच उसने अपनी बाहें फैलाकर कहा,
“यही है जीवन का असली सुख – जब इंसान अपने डर को जीतकर अपनी मंज़िल पाता है।”

वहाँ बैठे साधुओं ने उसकी ओर मुस्कुराकर देखा और बोले,
“अजय, तूने केवल पर्वत नहीं जीता, बल्कि अपनी हिम्मत, आत्मविश्वास और धैर्य से पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन गया है।”

उन्होंने अजय को “वीर सम्मान” दिया और आशीर्वाद दिया कि वह जीवनभर साहस और प्रेरणा का दीपक जलाए रखे।

गाँव में वापसी

जब अजय गाँव लौटा, तो लोग उसकी जय-जयकार करने लगे। वह सिर्फ़ एक साधारण लड़का नहीं रहा, बल्कि साहस और संघर्ष का प्रतीक बन गया। उसने गाँव के बच्चों को सिखाया,
“कभी मत सोचो कि तुम छोटे हो या कमजोर हो। अगर विश्वास मजबूत है तो हर पर्वत छोटा हो जाता है। लक्ष्य वही पाता है जो हार नहीं मानता।

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शुक्रवार, अगस्त 1

समझदार दोस्त

समझदार दोस्त

बहुत समय पहले की बात है, दो अरबी दोस्तों को एक बहुत बड़े खजाने का नक्शा मिला, खजाना किसी रेगिस्तान के बीचो-बीच था।

दोनों ने योजना बनाना शुरू की, खजाने तक पहुँचने के लिए बहुत लम्बा समय लगता और रास्ते में भूख- प्यास से मर जाने का भी खतरा था। बहुत विचार करने पर दोनों ने तय किया कि इस योजना में एक और समझदार दोस्त को शामिल किया जाए, ताकि वे एक और ऊंट अपने साथ ले जा सकें जिस पर खाने-पीने का ढ़ेर सारा सामान भी आ जाए और खजाना अधिक होने पर वे उसे ऊंट पर ढो भी सकें।

पर सवाल ये उठा कि चुनाव किसका किया जाए?

बहुत सोचने के बाद गुरु और बबलू को चुना गया। दोनों हर तरह से बिलकुल एक तरह के थे और कहना मुश्किल था कि दोनों में अधिक बुद्धिमान कौन है? इसलिए एक प्रतियोगिता के जरिये सही व्यक्ति का चुनाव करने का फैसला किया गया।

दोनों दोस्तों ने उन्हें एक निश्चित स्थान पर बुलाया और बोले, “आप लोगों को अपने-अपने ऊंट पर सवार होकर सामने दिख रहे रास्ते पर आगे बढ़़ना है। कुछ दूर जाने के बाद ये रास्ता दो अलग-अलग रास्तों में बंट जाएगा- एक सही और एक गलत। जो इंसान सही रास्ते पर जाएगा वही हमारा तीसरा साथी बनेगा और खजाने का एक-तिहाई हिस्सा उसका होगा।”

दोनों ने आगे बढ़ना शुरू किया और उस बिंदु पर पहुँच गए जहाँ से रास्ता बंटा हुआ था।

वहां पहुँच कर गुरु ने इधर-उधर देखा, उसे दोनों रास्तों में कोई अंतर समझ नहीं आया और वह जल्दी से बांये तरफ बढ़़ गया। जबकि, बबलू बहुत देर तक उन रास्तों की ओर देखता रहा, और उन पर आगे बढ़ने के नतीजे के बारे में सोचता रहा।

करीब 1 घंटे बाद बायीं ओर के रास्ते पर धूल उड़ती दिखाई दी। गुरु बड़ी तेजी से उस रास्ते पर वापस आ रहा था।

उसे देखते ही बबलू मुस्कुराया और बोला, “गलत रास्ता ?”

“हाँ, शायद!”, गुरु ने जवाब दिया।

दोनों दोस्त छुप कर यह सब देख रहे थे और वे तुरंत उनके सामने आये और बोले, “बधाई हो!”

“शुक्रिया!”, बबलू ने फ़ौरन जवाब दिया।

“तुम्हे नहीं, हमने गुरु को चुना है।”, दोनों दोस्त एक साथ बोले।

“पर गुरु तो गलत रास्ते पर आगे बढ़ा था… फिर उसे क्यों चुना जा रहा है?”, बबलू गुस्से में बोला।

“क्योंकि उसने ये पता लगा लिया कि गलत रास्ता कौन है और अब वो सही रास्ते पर आगे जा सकता है, जबकि तुमने पूरा वक़्त बस एक जगह बैठ कर यही सोचने में गँवा दिया कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत। समझदारी किसी चीज के बारे में ज़रूरत से ज्यादा सोचने में नहीं बल्कि एक समय के बाद उस पर काम करने और तजुर्बे से सीख लेने में है।”, दोस्तों ने अपनी बात पूरी की, और खजाने की तरफ चल दिये, बबलू बैठा बैठा वहीं पछताता रहा..!!

शिक्षा:- हमारे जीवन में भी कभी न कभी ऐसा स्थान (समय) आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत और ऐसे में बहुत से लोग बस सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं, जबकि ज़रुरत इस बात की है कि चीजों को विश्लेषण करने की बजाय गुरुजी की तरह अपने विकल्प को समझ करके निर्णय लिया जाए और अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ा जाए।

मंगलवार, जून 11

आनंदित रहने की कला


एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए। राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्याएँ बताते हुए कहा कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है। राजा का बेटा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है। जब भी उसे कोई पात्र इंसान मिलेगा, जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों, तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा।

गुरु ने कहा - "राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई इंसान मिल सकता है?" राजा ने कहा - "मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागड़ोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ।"
गुरु ने पूछा - "अब तुम क्या करोगे?"  राजा बोला - "मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए।" गुरु ने कहा - "मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा।"

राजा बोला - "फिर ठीक है, "मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा।" गुरु ने कहा - "अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है। क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे?"

राजा बोला - "कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ।" गुरु ने कहा - "मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना।"

एक वर्ष बाद गुरु ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था। अब तो दोनों ही काम हो रहे थे। जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था। अब उसे कोई चिंता नहीं थी।

इस कहानी से समझ में आएगा की वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ? कुछ भी तो नहीं! राज्य वही, राजा वही, काम वही, सिर्फ दृष्टिकोण बदल गया ।

इसी तरह हम भी जीवन में अपना दृष्टिकोण बदलें। मालिक बनकर नहीं, बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें की, "मैं ईश्वर कि नौकरी कर रहा हूँ" अब ईश्वर ही जाने। सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें। फिर ही आप हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे।

सोमवार, जून 10

बुद्धिमान हंस


एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बहुत सारे हंस रहते थे। उनमें एक बहुत बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी हंस था। सब उसका आदर करते और सभी उसको ताऊ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? 

बुद्धिमान हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? 

तीसरा हंस बोला - ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी भी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी? समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। 

एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया। शाम को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो। दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो  आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे |

सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना। सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया।

भावार्थ - वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं। वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है, बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई बोझ नहीं हैं।

मंगलवार, अप्रैल 25

संघर्ष का महत्व

एक बार एक किसान परमात्मा से बहुत नाराज़ हो गया। हर साल उसकी फ़सल किसी न किसी कारण से खराब हो जाती थी। कभी बाढ़ आती, कभी सूखा पड़ता, कभी तेज धूप तो कभी ओलों से खेत बर्बाद हो जाते।

किसान दुखी होकर बोला –
"हे प्रभु, आप परमात्मा हैं लेकिन खेती-बाड़ी की आपको शायद ज्यादा जानकारी नहीं है। हर बार मेरी फ़सल खराब हो जाती है। कृपा करके मुझे एक साल का मौका दीजिए। उस साल मौसम मेरी इच्छा के अनुसार होगा। तब आप देखना मैं कैसे अन्न के भंडार भर देता हूँ।"

परमात्मा मुस्कुराए और बोले -
"ठीक है, जैसा तुम चाहोगे वैसा ही मौसम होगा। इस साल मैं कोई दखल नहीं दूँगा।"

किसान के अनुसार मौसम

अब किसान ने गेहूं की फ़सल बोई। जब उसे धूप चाहिए थी, धूप मिल गई। जब पानी चाहिए था, बारिश हो गई। उसने तेज आंधी, बाढ़, ओले और तूफ़ान को आने ही नहीं दिया।

दिन बीतते गए और फसल खूब लहलहाने लगी। किसान खुशी से झूम उठा। उसे लगा -
"अब परमात्मा को समझ आएगा कि खेती कैसे की जाती है। कितने साल से बेकार में हमें परेशान करते आ रहे हैं। इस साल अनाज की भरपूर पैदावार होगी।"

कटाई का समय और किसान का सदमा

समय बीता और फसल कटने का मौसम आ गया। किसान बड़े गर्व और उत्साह के साथ खेत में पहुँचा। सुनहरी बालियाँ देखकर उसका मन प्रसन्न हो उठा।

लेकिन जैसे ही उसने फसल काटनी शुरू की, वह चौंक गया। हर एक बाली अंदर से खाली थी। गेहूं का एक भी दाना नहीं था। पूरी फ़सल खोखली निकली।

किसान छाती पकड़कर बैठ गया और दुखी होकर बोला -
"हे प्रभु, ये क्या हुआ? मैंने तो धूप, पानी और सब कुछ सही समय पर दिया था। फिर भी फ़सल खाली क्यों रह गई?"

परमात्मा का उत्तर

परमात्मा ने बड़ी शांति से कहा -
"ये तो होना ही था। तुमने अपने पौधों को संघर्ष करने का एक भी मौका नहीं दिया। ना तेज धूप में उन्हें तपने दिया, ना आंधी-पानी से जूझने दिया। जब पौधे कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, तभी वे मजबूत बनते हैं और अनाज पैदा करते हैं।"

"संघर्ष ही शक्ति देता है, ऊर्जा देता है, जीवन में गहराई और मजबूती लाता है। सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपना और हथौड़े से पिटना पड़ता है। ठीक वैसे ही इंसान और पौधे भी चुनौतियों से गुजरकर ही अनमोल बनते हैं।"

शिक्षा:- इसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता। ये चुनौतियां ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनौतियां तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे। अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा।



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गुरुवार, मार्च 23

सच्ची जीत

एक गांव में एक किसान रहता था। उसका नाम शेर सिंह था । शेर सिंह जैसा भंयकर और अभिमानी उस गाँव में कोई न था । वह बात-बात पर बिगड़ जाता और लड़ाई कर लेता था। वह गांव के लोगों से सीधे मुंह बात तक नहीं करता था। न तो वह कभी किसी के घर जाता और न ही रास्ते में मिलने पर किसी को प्रणाम करता था। गांव का कोई भी व्यक्ति उसके इसी अहंकार के कारण उससे बात करने में भी इच्छुक नही था |  

कुछ समय बाद, उसी गांव में एक दयाराम नाम का एक किसान आकर रहने लगा। वह बहुत सीधा और भला आदमी था। सबसे विनम्रता से बोलता था। सबकी कुछ न कुछ सहायता किया करता था। सभी किसान उसका आदर करते और अपने कामों में उससे सलाह लिया करते थे। 

गांव के किसान ने दयाराम से कहा, “भाई दयाराम! तुम कभी शेर सिंह के घर मत जाना। उससे दूर ही रहना। वह बहुत झगड़ालू व्यक्ति है।” 

दयाराम ने हंसकर कहा, “शेर सिंह ने मुझसे झगड़ा किया तो, मैं उसे मार ही डालूंगा।” 

दूसरे किसान भी हंस पड़े। वे जानते थे कि दयाराम बहुत दयालु है। वह किसी को मारना तो दूर, किसी को गाली तक नहीं दे सकता। लेकिन यह बात किसी ने शेर सिंह से कह दी। शेर सिंह क्रोध से लाल हो गया। वह उसी दिन से दयाराम से झगड़ने की चेष्टा करने लगा। उसने दयाराम के खेत में अपने बैल छोड़ दिए। बैल बहुत-सा खेत चर गए, किंतु दयाराम ने उन्हें चुपचाप खेत से हांक दिया। 

शेर सिंह ने दयाराम के खेत में जाने वाली पानी की नाली तोड़ दी। पानी बहने लगा। दयाराम ने आकर चुपचाप नाली बांध दी। इसी प्रकार शेर सिंह बराबर दयाराम की हानि करता रहा, परंतु दयाराम ने एक बार भी उसे झगड़ने का अवसर नहीं दिया। 

एक दिन दयाराम के यहां उनके संबंधी ने लखनऊ के मीठे खरबूजे भेजे, दयाराम ने सभी किसानों के घर एक-एक खरबूजा भेज दिया, लेकिन शेर सिंह ने उसका खरबूजा यह कह कर लौटा दिया कि “मैं भिखारी नहीं हूं। मैं दूसरों का दान नहीं लेता।” 

बरसात आई। शेर सिंह एक गाड़ी अनाज भर कर दूसरे गांव से आ रहा था। रास्ते में एक नाले में कीचड़ में उसकी गाड़ी फंस गई। शेर सिंह के बैल दुबले थे। वे गाड़ी को कीचड़ में से निकाल नहीं सके। जब गांव में इस बात की खबर पहुंची तो सब लोग बोले, “शेर सिंह बड़ा दुष्ट है। उसे रात भर नाले में पड़े रहने दो।” 

लेकिन दयाराम ने अपने बलवान बैल पकड़े और नाले की ओर चल पड़ा। लोगों ने उसे रोका और कहा, “दयाराम! शेर सिंह ने तुम्हारी बहुत हानि की है। तुम तो कहते थे कि मुझसे लड़ेगा तो उसे मार ही डालूंगा। फिर तुम आज उसकी सहायता करने क्यों जाते हो?” 

दयाराम बोला, “मैं आज सचमुच उसे मार डालूंगा। तुम लोग सवेरे उसे देखना।” 

जब शेर सिंह ने दयाराम को बैल लेकर आते देखा तो गर्व से बोला, “तुम अपने बैल लेकर लौट जाओ। मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिए।” 

दयाराम ने कहा, “तुम्हारे मन में आवे तो गाली दो, मन में आवे मुझे मारो, इस समय तुम संकट में हो। तुम्हारी गाड़ी फंसी है और रात होने वाली है। मैं तुम्हारी बात इस समय नहीं मान सकता।”

दयाराम ने शेर सिंह के बैलों को खोलकर अपने बैल गाड़ी में जोत दिए। उसके बलवान बैलों ने गाड़ी को खींचकर नाले से बाहर कर दिया। शेर सिंह गाड़ी लेकर घर आ गया। उसका दुष्ट स्वभाव उसी दिन से बदल गया। वह कहता था, “दयाराम ने अपने उपकार के द्वारा मुझे मार ही दिया। अब मैं वह अहंकारी शेर सिंह नहीं रहा।” 

अब वह सबसे नम्रता और प्रेम का व्यवहार करने लगा। बुराई को भलाई से जीतना ही सच्ची जीत है। और इस प्रकार दयाराम ने सच्ची जीत पाई।

रविवार, फ़रवरी 7

सुनहरा पक्षी

सुनहरा पक्षी

एक गांव में एक धनी व्यापारी रहता था | उसके पास धन तो बहुत था पर वह आलसी भी बहुत था| व्यापर के सभी कार्य उसने नौकरो पर छोड़ दिए थे और नौकर भी उसे आमदनी का पूरा हिस्सा नहीं देते थे | धीरे-धीरे उसका व्यापार मंदा होने लगा, अधिक आलस्य के कारण उस धनि व्यक्ति स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था | एक दिन उस व्यापारी का बचपन का एक मित्र उसके घर आया | व्यापारी ने अपनी बीमारी के बारे में उसे बताया तो, मित्र ने कहा - "भाई, तुम्हारी बीमारी को दूर करने का एक उपाय है मेरे पास लेकिन उसके लिए तुम्हें सुबह जल्दी उठना पड़ेगा |" व्यापारी उत्सुकता से बोला - "मैं तैयार हूँ |" मित्र बोला - "प्रत्येक प्रभातवेला में एक सुनहरा पक्षी आता है, यदि तुम उसे देख लोगे तो तुम्हारे सभी समस्याएं दूर हो जाएँगी|" 


वह व्यापारी दूसरे दिन से ही सुबह जल्दी उठकर अपने खेतों की तरफ चल पड़ा | रास्ते में उसने देखा, उसका एक नौकर उसका सामान अपने घर ले जाने की तैयारी कर रहा था | मालिक को देखकर उसने अपना सामान वही छोड़ दिया और घर चला गया | अगले दिन व्यापारी ने देखा की उसका ग्वाला गाय का दूध निकालने के बाद दूध का बर्तन अपने घर की ओर ले जा रहा था | मालिक को देख वह भी दूध का बर्तन छोड़ भाग खड़ा हुआ| 


अब व्यापारी रोज सुबह उठकर उस सुनहरे-पक्षी की खोज में जाता तो सभी नौकर सचेत हो जाते, ठीक से काम करने लगते | दूध की अधिक मात्रा में बिक्री होने लगी, खेतों से भी पूरी उपज गोदामों में पहुंचने लगी, दुकान और गोदामों में होने वाली चोरी भी बंद हो गयी | अब उस व्यापारी को भी सुबह उठना अच्छा लगने लगा | 


एक दिन उसी मित्र के पुनः मिलने पर व्यापारी ने उस सुनहरे पक्षी के बारे में पूछा, तो मित्र ने हंसकर कहा - "कौन सा सुनहरा पक्षी?" मित्र के इस जवाब से वह व्यापारी एकदम से दंग रह गया | व्यापारी की उलझन को देखते हुए उसका मित्र उसे समझाता है कि तुम्हारे स्वास्थ्य और तुम्हारी उन्नति के रूप में वह सुनहरा पक्षी तुम्हें बहुत पहले ही मिल चुका हैं | 


सारांश: हम लोग भी इस तरह सुनहरे पक्षी की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं परन्तु हम कभी भी अपनी सेहत और अपने जीवन की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते है, हम लोग सिर्फ पैसो के पीछे भागते रहते है | जीवनयापन के आज के इस भागदौड़ में हम जितना तकनीक के नजदीक हो रहे उतना ही सभी अपनी सेहत को हानि पंहुचा रहे और आलस्य जाते रहे है | 



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सोमवार, मार्च 11

प्रभु की महिमा

प्रभु की महिमा

यह सभी जानते हैं की छोटी उम्र के बच्चे बहुत ही हठी होते हैं यदि वे किसी एक बात पर हठ करले तो वह अपनी बात मनवा कर ही मानते हैं| परन्तु जब यही हठ सच्चा और निस्वार्थ हो तो इस हठ के आगे प्रभु भी झुक जाते हैं|

एक छोटा सा बालक अक्सर अपने माता-पिता से परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसकी सिर्फ इतनी ही इच्छा थी की एक समय का भोजन वह परमात्मा के साथ मिलकर करे| और अपनी इसी हठ के कारण 1 दिन उसने अपने थैले में 5, 6 रोटियां रखीं और परमात्मा को ढूंढने निकल पड़ा। चलते चलते वह नदी किनारे तक आ पंहुचा था और संध्या का समय भी हो गया।

उसने देखा नदी के तट पर 1 बुजुर्ग व्यक्ति बैठा हैं और ऐसा लग रहा था मनो जैसे वह बुजुर्ग उसी बच्चे के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों।

वह नन्हा-सा बालक, उस बुजुर्ग व्यक्ति के पास जा कर बैठ गया और अपने थैले में से १ रोटी निकालकर खाने लगा। उस बालक ने अपना रोटी वाला उस हाथ बुजुर्ग व्यक्ति की ओर बढ़ाया और मुस्कुराने लगा, बुजुर्ग ने भी रोटी ले ली और खाने लगा। उस बुजुर्ग व्यक्ति के झुर्रियों वाले चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी छा गई, उसकी आँखों से  ख़ुशी के आंसू छलकने लगे|

बच्चा बढ़ी ही मासूमियत से उस बुजुर्ग व्यक्ति को लगातार देखे जा रहा था, जब उस बुजुर्ग व्यक्ति ने रोटी खा ली तो बच्चे ने उन्हें एक और रोटी दे दी।

वह बुजुर्ग व्यक्ति अब बहुत खुश था। बच्चा भी बहुत खुश दिखाई दे रहा था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह के पल बिताये। जब रात घिरने लगी तो बच्चा उस बुजुर्ग व्यक्ति से इजाज़त ले घर की ओर चलने लगा।
वह बार-बार पीछे मुड़ कर देखता, तो पाता की वह बुजुर्ग व्यक्ति भी उसी की ओर देख रहा था।
बच्चा घर पहुँचता हैं तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी, बच्चा भी बहूत खुश था।

माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो अपने बच्चे से उसकी ख़ुशी का कारण पूछा, बच्चे ने बताया- "माँ....आज मैंने परमात्मा को देखा उनके साथ बैठ कर रोटी खाई और बहुत सारी बातें भी की|" माँ आपको पता है उन्होंने मेरी रोटी भी खायी और भी मुझे ढेर सारा प्यार भी किया परन्तु माँ भगवान् बहुत वृद्ध हो गये हैं उनके चेहरे पर झुर्रिया दिखाई दे रही थी|

मैं आज सच में बहुत खुश हूँ….माँ
दूसरी तरफ बुजुर्ग व्यक्ति भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा वह आज बहुत खुश हैं, तो एक ने उनसे उनके खुश होने का कारण पूछा?

बुजुर्ग व्यक्ति ने बताया - "मैं पिछले 2 दिनों से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था, किसी ने मुझ पर दया नहीं दिखाई परन्तु मेरा विश्वास था की मेरे प्रभु जरूर आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।

और तुम्हे पता हैं आज मेरे प्रभु आए थे, उन्होंने बढे प्यार से मुझे रोटी खिलाई और वही मेरे साथ बैठ कर स्वयं भी रोटी खाई, प्रभु बहुत प्यार से मेरी और देखते और मुस्कुरा जाते, जाते समय उन्होंने मुझे गले भी लगाया| वह तो एक बहुत ही मासूम से बच्चे की तरह दिखते हैं।

सारांश:

असल में बात सिर्फ इतनी सी थी की दोनों के दिलों में परमात्मा के लिए जो प्यार और श्रद्धा थी, वो बहुत ही सच्ची थी। परमात्मा ने भी दोनों को, दोनों के लिये, दोनों में ही खुद (परमात्मा) को भेज दिया। जब मन परमात्मा की  भक्ति में रम जाता है तो हमे हर एक में वो ही नजर आने लगता हैं|


Tags: Lord's Glory, God's Grace, Stubbornness of a Child

सोमवार, दिसंबर 24

हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र

हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र

बहुत से लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा के अध्ययन से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है। माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व की थी। हनुमान जी को गुरु बनाकर उन्होंने प्रभु श्रीराम को पाने की शुरुआत की। 

अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे ही रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र को भी समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलना निश्चित हैं। 

हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई सर्वप्रथम चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं।

शुरुआत गुरु से…

हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…

श्रीगुरु चरन सरोज रज, 
निज मनु मुकुरु सुधारि।

अर्थात - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।

गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं। 

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी परन्तु माता-पिता को ही पहला गुरु ही कहा गया है। 

समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।

ड्रेसअप का रखें ख्याल

कंचन बरन बिराज सुबेसा, 
कानन कुंडल कुंचित केसा।

अर्थात - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।

आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए। (First Impression is Last Impression)

अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।

सिर्फ डिग्री काम नहीं आती

बिद्यावान गुनी अति चातुर, 
राम काज करिबे को आतुर।

अर्थात - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।

आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन हनुमान चालीसा के अनुसार सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।

अच्छे श्रोता (Listener) बनें

प्रभु चरित सुनिबे को रसिया, 
राम लखन सीता मन बसिया।

अर्थात - आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं। 

जो आपकी प्राथमिकता है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए। अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी भी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।

कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, 
बिकट रुप धरि लंक जरावा।

अर्थात - आपने अशोक वाटिका में सीता माता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।

कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। जब वह सीता माता से अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर आकार के रूप में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। 

अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।

अच्छे सलाहकार बनें

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, 
लंकेस्वर भए सब जग जाना।

अर्थात - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।

हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दी। विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।

आत्मविश्वास की कमी ना हो

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, 
जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।

अर्थात - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।

अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल कार्य को आसानी से पूरा कर सकते हैं। 

आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत जल्दी टूट जाता है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास और धैर्य की कमी होना खतरनाक है। अपने आप पर और भक्तवत्सल हनुमान जी पूरा विश्वास रखे।


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