संतों की सभा और एक साधारण-सा घड़ा
एक शांत स्थान पर संतों की एक सभा लगी हुई थी। चारों ओर भक्ति, शांति और आध्यात्मिक वातावरण था। दूर-दूर से आए संत एकत्र होकर ईश्वर की चर्चा कर रहे थे। सभा के एक कोने में मिट्टी का एक साधारण-सा घड़ा रखा हुआ था। उस घड़े में निर्मल गंगाजल भरा गया था, ताकि प्यास लगने पर संतजन उसमें से जल ग्रहण कर सकें।
सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देखने लगा। कुछ देर बाद उसके मन में विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। वह सोचने लगा, "कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न जाने कितने घड़ों में पानी भरा होगा, लेकिन इसे तो गंगाजल रखने का सौभाग्य मिला है। ऊपर से संतों की सेवा का अवसर भी! संत इसे छुएंगे, इससे जल ग्रहण करेंगे... सचमुच इसकी किस्मत तो बहुत अच्छी है।"
जब घड़े ने अपनी कहानी सुनाई
वह व्यक्ति अभी इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि अचानक उसे लगा जैसे घड़ा उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहा है। तभी एक धीमी-सी आवाज सुनाई दी, "बंधु, क्या सच में तुम्हें लगता है कि मैं भाग्यशाली पैदा हुआ था?" वह व्यक्ति चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन आसपास कोई नहीं था। फिर घड़े की आवाज आई, "तुम्हें मेरी आज की स्थिति दिखाई दे रही है, लेकिन मेरी पूरी कहानी नहीं। अगर सुनना चाहते हो, तो मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं।"
घड़ा जैसे वर्षों पुरानी यादों में खो गया और बोला, "एक समय था जब मैं सिर्फ मिट्टी था। जमीन के अंदर पड़ा हुआ, बिल्कुल साधारण और किसी काम का नहीं। न मेरी कोई पहचान थी और न कोई ऐसा उद्देश्य, जिससे मुझे लगता कि मेरा जीवन सार्थक है। फिर एक दिन एक कुम्हार वहां आया। उसने फावड़ा उठाया और मुझे खोदना शुरू कर दिया। फावड़े की हर चोट मुझे दर्द देती थी। मैं सोचता था कि आखिर मैंने ऐसा क्या अपराध किया है, जो मेरे ऊपर इतनी चोटें की जा रही हैं? मुझे क्या पता था कि वही चोटें मेरे नए जीवन की पहली सीढ़ी हैं।"
मिट्टी से घड़ा बनने की कठिन यात्रा
घड़ा आगे बोला, "कुम्हार मुझे गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां पहुंचते ही उसने मुझे पैरों से रौंदना शुरू कर दिया। फिर मेरे अंदर पानी डाला, मुझे बार-बार गूंथा और मेरी पुरानी अवस्था को पूरी तरह बदलने लगा। मैं भीतर से टूटता जा रहा था और मन ही मन भगवान से शिकायत करता था कि पहले फावड़े की चोटें और अब पैरों से कुचलना... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?" लेकिन कुम्हार रुका नहीं। उसने मुझे चाक पर चढ़ा दिया। चाक तेजी से घूमने लगा और कुम्हार कभी मुझे दबाता, कभी खींचता और कभी थपथपाकर आकार देता। कभी मैं इधर झुकता तो कभी उधर। मुझे लग रहा था कि मेरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। मैं सोचता था कि शायद भगवान ने मेरे लिए केवल कष्ट ही लिखे हैं।
लेकिन मेरी परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे उठाया और भट्ठी के अंदर डाल दिया। चारों ओर आग थी और भीषण गर्मी से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उस समय मैंने पहली बार भगवान से शिकायत की। मैंने मन ही मन कहा, "हे प्रभु! आखिर मेरी गलती क्या है? पहले खोदा, फिर कुचला, फिर चाक पर घुमाया और अब आग में जला रहे हो। अगर आप सच में हैं, तो मुझे बचाते क्यों नहीं?" लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आग बढ़ती गई और मैं तपता रहा।
जिसे मैं सजा समझ रहा था, वह मेरी तैयारी थी
आखिर एक दिन भट्ठी का दरवाजा खुला और मैं बाहर आया। मैं वही मिट्टी नहीं था, जो कभी जमीन के अंदर पड़ी रहती थी। अब मैं एक घड़ा बन चुका था। लेकिन मेरी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। कुम्हार ने मुझे गधे पर लादा और बाजार में ले गया। वहां लोग मुझे उठाकर देखते, घुमाते और ठोक-ठोककर जांचते कि मैं ठीक हूं या नहीं। हर ठोकर मुझे फिर चोट जैसी लगती थी। मैं सोचता था कि इतना सब सहने के बाद भी लोग मुझे क्यों परख रहे हैं? और जब आखिरकार मेरी कीमत लगाई गई, तो वह भी केवल 20-30 रुपये! उस समय मैं अंदर से पूरी तरह टूट गया। मैंने आसमान की ओर देखकर कहा, "हे भगवान! मेरी इतनी सारी पीड़ा की कीमत बस इतनी सी है?"
फिर मेरी जिंदगी बदल गई
घड़ा कुछ क्षण के लिए शांत हुआ और फिर बोला, "लेकिन मेरी असली कहानी तो इसके बाद शुरू हुई। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और अपने घर ले गए। मुझे लगा था कि शायद अब मुझे किसी कोने में रख दिया जाएगा। लेकिन उन्होंने मेरे अंदर गंगाजल भरा और मुझे संतों की इस सभा में ले आए। आज मैं यहां रखा हूं। संत मेरे पास आते हैं, मेरे अंदर भरे गंगाजल को ग्रहण करते हैं और लोग मुझे देखकर कहते हैं कि मैं कितना भाग्यशाली हूं।"
घड़े ने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, "लेकिन आज मुझे अपनी पूरी कहानी समझ में आती है। अगर उस दिन कुम्हार ने मुझे फावड़े से नहीं खोदा होता तो मैं मिट्टी ही पड़ा रहता। अगर उसने मुझे पैरों से नहीं रौंदा होता तो मैं कभी आकार नहीं ले पाता। अगर उसने मुझे चाक पर नहीं घुमाया होता तो मैं घड़ा नहीं बनता। अगर उसने मुझे आग में नहीं तपाया होता तो मैं मजबूत नहीं बनता। और अगर बाजार में लोगों ने मुझे ठोककर नहीं परखा होता तो मेरी मजबूती का पता कैसे चलता?"
फिर घड़े ने कहा, "जिसे मैं उस समय भगवान का अन्याय समझ रहा था, आज वही उनकी सबसे बड़ी कृपा दिखाई दे रही है। उस समय मुझे केवल दर्द दिखाई देता था, अपना भविष्य नहीं। इसलिए हर चोट मुझे सजा लगती थी। आज समझ आया कि भगवान मुझे तोड़ नहीं रहे थे, बल्कि मुझे उस योग्य बना रहे थे, जिसके लिए मेरा जन्म हुआ था।"
हमारी जिंदगी भी उस घड़े जैसी है
घड़े की कहानी सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर तक शांत बैठा रहा। उसके मन में जैसे कई सवालों के जवाब मिल गए थे। सच तो यह है कि हमारी जिंदगी भी उस घड़े से अलग नहीं है। कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते। कभी मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलती, कभी कोई रास्ता अचानक बंद हो जाता है, कभी अपने ही लोग साथ छोड़ देते हैं और कभी ऐसा लगता है कि हमने भगवान से इतनी प्रार्थनाएं कीं, इतने प्रयास किए, फिर भी हमारी सुनवाई क्यों नहीं हो रही।
ऐसे समय में हम भी उस मिट्टी की तरह सोचने लगते हैं, "आखिर मेरे साथ ही क्यों?" लेकिन समस्या यह है कि हमें केवल वर्तमान दिखाई देता है, भविष्य नहीं। हमें दर्द दिखाई देता है, उसके पीछे छिपा उद्देश्य नहीं दिखाई देता। हमें बंद दरवाजा दिखाई देता है, लेकिन यह नहीं पता होता कि शायद उसी दरवाजे के पीछे हमारे लिए कोई बेहतर रास्ता तैयार हो रहा है।
हर कठिनाई का एक उद्देश्य हो सकता है
कुम्हार मिट्टी को इसलिए नहीं रौंदता कि वह उससे नफरत करता है। वह मिट्टी को इसलिए गूंथता और आकार देता है क्योंकि वह जानता है कि बिना उस प्रक्रिया के एक सुंदर और मजबूत घड़ा तैयार नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जीवन की हर कठिन परिस्थिति हमेशा सजा नहीं होती। कई बार वह हमारे व्यक्तित्व को मजबूत करने, हमारी सोच को बदलने और हमें किसी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य बनाने की तैयारी होती है।
जिस तरह मिट्टी को यह पता नहीं होता कि वह एक दिन घड़ा बनेगी, उसी तरह इंसान को भी अक्सर यह पता नहीं होता कि उसकी आज की परेशानी उसके कल की पहचान बनने वाली है। इसलिए जब जीवन आपको चाक पर घुमाए, परिस्थितियां आपको रौंदें, समय आपको आग में तपाए और लोग आपको ठोक-ठोककर परखें, तो तुरंत यह मत मान लेना कि भगवान ने आपको छोड़ दिया है। हो सकता है, आपके जीवन का सबसे सुंदर रूप अभी बन ही रहा हो।
परीक्षा के समय विश्वास मत खोइए
जीवन की कठिन परीक्षा के दौरान सबसे जरूरी है कि हम सत्य और न्याय का रास्ता न छोड़ें। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने संस्कार, ईमानदारी और विश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। ईश्वर की कृपा किसी के जीवन में जल्दी दिखाई देती है तो किसी के जीवन में देर से, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर ने किसी को भुला दिया है।
कई बार हमें लगता है कि हमारी प्रार्थनाएं स्वीकार नहीं हो रहीं, लेकिन संभव है कि ईश्वर हमारी इच्छा पूरी करने से पहले हमें उसके योग्य बना रहे हों। आखिर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपता जिसे गाड़ी चलाना ही न आता हो। उसी तरह ईश्वर भी अपनी बड़ी कृपा और बड़ी जिम्मेदारियां उसी व्यक्ति को सौंपते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रख सके और सही रास्ते पर टिक सके।
अंत में बस इतना याद रखिए
जब भी जीवन में कोई कठिन दौर आए, तो एक बार उस घड़े को जरूर याद कीजिए। याद रखिए कि फावड़े की चोट, पैरों से कुचला जाना, चाक पर घूमना, आग में तपना और बाजार में ठोकरें खाना, इनमें से कोई भी घटना उस घड़े को नष्ट करने के लिए नहीं थी। हर कष्ट उसे उसके वास्तविक रूप तक पहुंचाने की तैयारी था।
हो सकता है आज आप भी अपनी जिंदगी के किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हों और आपको समझ नहीं आ रहा हो कि आपके साथ ही इतना कुछ क्यों हो रहा है। लेकिन शायद आपकी कहानी भी अभी अधूरी है। शायद जो कुछ आज आपको अन्याय लग रहा है, वही कल आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाए।
इसलिए परिस्थितियों से घबराइए मत, ईश्वर पर विश्वास रखिए और सत्य के रास्ते से कभी मत हटिए।
क्योंकि हो सकता है-
"जिस दर्द को आप आज अपनी सजा समझ रहे हैं, वही कल आपकी सबसे बड़ी कृपा की वजह बन जाए।"
और याद रखिए, मिट्टी को जब तक आग में नहीं तपाया जाता, तब तक वह घड़ा नहीं बनती। उसी तरह इंसान भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर ही अपने वास्तविक सामर्थ्य को पहचानता है।













