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गुरुवार, जून 18

राम नाम का चमत्कार

राम नाम का चमत्कार

एक बार एक गांव में एक साधु रहता था, सारा दिन राम-राम जपता रहता और ढोलकी बजाकर कीर्तन करता रहता| उसकी कुटिया के पास जिस व्यक्ति का घर था, वह उससे बहुत परेशान था|  एक दिन वह व्यक्ति गुस्से में उस साधु की कुटिया में चला गया और कहने लगा कि तुम क्या दिन-रात राम-राम रटते रहते हो? तुम्हें तो कोई काम धंधा नहीं है, हमें तो कमाने जाना पड़ता है, तुम्हारी ढोलकी की आवाज से मैं सो नहीं पाता.

साधु कहने लगा - "तुम भी मेरे साथ राम-राम जप के देखो तब तुम्हें पता चलेगा कितना आनंद आता है|" उस व्यक्ति ने थोड़ा खींझकर कहा,"अगर मैं तुम्हारे साथ राम-राम जपता हूं तो क्या तुम्हारा राम मुझे खाने के लिए रोटी देगा? साधु कहने लगा कि "मुझे तो राम नाम की लगन लगी है मुझे तो राम जी की कृपा से हर रोज भोजन मिल ही जाता है| तुम भी राम-राम जप के देख लो मुझे भरोसा है भगवान तुझे खाने को जरूर देगा|

वह आदमी उस साधु को चुनौती देता है कि मैं तुम्हारे साथ आज राम-राम का भजन करता हूं, अगर तुम्हारे राम ने आज मुझे रोटी खिला दी तो सारी उम्र राम की भक्ति में लगा दूंगा| अगर नहीं खिलाई तो तुम ढोलकी बजाना बंद कर दोगे| साधू कहता है कि मैंने तो निष्काम भाव से प्रभु राम की भक्ति की है लेकिन फिर भी मुझे तुम्हारी चुनौती मंजूर है| 

वह व्यक्ति साधु के साथ बैठकर राम-राम का जाप करता है और मन में निश्चय करता है कि चाहे कुछ हो जाए मैं आज भोजन नहीं करूँगा, देखता हूँ इसका राम मुझे कैसे भोजन कराता है| राम-राम का भजन करने के बाद वह सोचता है कि अगर अब मैं घर जाता हूं तो मेरी मां और बीवी मुझे खाने को कहेंगे और मुझे रोटी खानी पड़ सकती है| लेकिन मुझे साधु को चुनौती में हराना है इसलिए वह घर जाने की बजाए गांव के पास के जंगल में चला जाता है|

जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर बैठ जाता है, वह सोचता है कि मैं सारा दिन इस पेड़ से उतरूंगा ही नहीं, अन्न का दाना भी नहीं खाऊंगा, इस तरह मैं साधु को हरा दूंगा और उसका ढोलकी बजाना बंद हो जाएगा|

कुछ देर बाद उस जंगल से एक बंजारों की टोली गुजरती है|

उन्हें भूख लगी होती है तो बंजारों का सरदार कहता है कि आग जलाकर यहीं पर खाना बना लो, अब खाना खाकर ही आगे बढ़ेंगे, खाना बन कर तैयार हो जाता है| बंजारे खाना खाने ही वाले होते हैं, कि इतनी देर में बंजारों को सूचना मिलती है कि पीछे से डाकू आ रहे हैं तो बंजारों का सरदार कहता है कि हमें यहां से चले जाना चाहिए|

डाकू हमारा सब कुछ लूट सकते हैं, वे बंजारे खाना वही पर छोड़ कर चले जाते हैं, वह आदमी पेड़ पर चढा़ सब कुछ देख रहा था| कुछ समय बाद डाकू वहां पहुंच जाते हैं, भोजन को देखकर डाकू कहते हैं कि खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है, लेकिन यह भोजन किसने बनाया? बनाने के बाद खाया क्यों नहीं? कहीं किसी की चाल तो नहीं हमें फसाने की? हो सकता है इस भोजन में जहर हो| 

उसी समय डाकुओं के सरदार की नजर उस व्यक्ति पर पड़ी, वह उसे नीचे आने का आदेश देता है| डाकू उस व्यक्ति से पूछते हैं,"हमें मारने के लिए, क्या भोजन तुमने बनाया है?

वह बेचारा मिन्नते करता रहता है कि मैंने यह भोजन नहीं बनाया, इसमें जहर नहीं है|

यह भोजन बंजारों ने बनाया है आपके आने की खबर सुनकर वह जहां से भाग गए, लेकिन डाकूओं के आगे उसकी एक नहीं चली| डाकू उससे कहते हैं कि अब तुम्हें यह भोजन खा कर दिखाना पड़ेगा, क्योंकि हमें लगता है कि तुमने ही यह भोजन बनाया है और इसमें जहर मिलाया?

अब तुम ही सबसे पहले यह भोजन खाओगे, वह जिद्द पर अड़ा रहता है मैं यह भोजन नहीं खाऊंगा, किसी कीमत पर नहीं खाऊंगा| डाकूओं का शक ओर गहरा हो जाता है, वे बंदूक की नोक उसके सिर पर रखकर कहते हैं तुझे यह भोजन खाना पड़ेगा, नहीं तो गोली खानी पड़ेगी|

वह व्यक्ति भोजन कर रहा था और साधु को याद करते करते आंसू उसकी आँखों से बह रहे थे|

उसने कहा था कि मेरा निश्चय है कि राम नाम जप लेगा तो राम तुझे भोजन भी देंगे, उसके भोजन करने के बाद डाकूओं ने उसे छोड़ दिया| अब उसे विश्वास हो गया कि बंजारों को और डाकूओं को राम जी ने ही भेजा है| वह सीधा साधू की कुटिया में चला गया और जा कर उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सारा वृतांत सुनाया|

अब उस साधु से भी ज्यादा उसे राम नाम की लगन लग गई, उसने अपना पूरा जीवन राम जी को समर्पित कर दिया..!!

सोमवार, जून 15

जब तक दीपक जलता है

जब तक दीपक जलता है

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक युवक रहता था। उसका परिवार बेहद साधारण था। पिता लकड़ियाँ काटकर घर चलाते थे और माँ गाँव के लोगों के कपड़े सिलती थीं। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए रात को मिट्टी के दीपक की रोशनी में ही काम होता था। मोहन बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था। वह अक्सर गाँव के बाहर पहाड़ी पर बैठकर दूर शहर की चमकती रोशनियों को देखा करता था। उसे लगता था कि उन रोशनियों के पीछे कोई ऐसी दुनिया है जहाँ सपने सच होते हैं। लेकिन गाँव के लोग उसकी बातों पर हँसते थे। वे कहते, "मोहन, बड़े सपने देखने से कुछ नहीं होता। गरीब आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए।" मोहन उनकी बातें सुनता जरूर था, लेकिन अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने देता था।

एक छोटी-सी सीख

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उन्होंने लोगों को जीवन के बारे में कई बातें बताईं। जब सभा समाप्त हुई तो मोहन उनके पास गया और बोला, "महाराज, मैं अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास न साधन हैं और न ही अवसर। मैं क्या करूँ?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "बेटा, रात का अंधेरा कभी सूरज को रोक नहीं सकता। लेकिन सूरज बनने के लिए पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

मोहन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन उसने इसे अपने दिल में बसा लिया।

संघर्ष का दौर

कुछ वर्षों बाद पिता की तबीयत खराब हो गई। घर की जिम्मेदारी मोहन के कंधों पर आ गई। अब उसे दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी पड़ती थीं। शाम को थका हुआ शरीर जवाब दे देता, लेकिन वह फिर भी किताबें लेकर बैठ जाता। कई बार उसकी आँखें नींद से बंद होने लगतीं, फिर भी वह खुद को जगाकर पढ़ाई करता। उसे विश्वास था कि मेहनत का फल एक दिन जरूर मिलेगा। गाँव के कई लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन मोहन ने हार नहीं मानी।

पहली असफलता

एक दिन उसे शहर जाकर एक बड़ी छात्रवृत्ति परीक्षा देने का मौका मिला। उसने महीनों तैयारी की थी। परीक्षा हुई और वह पूरे विश्वास के साथ घर लौटा। लेकिन जब परिणाम आया, तो उसका नाम सूची में नहीं था। मोहन टूट गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई हो। कई दिनों तक उसने किताबों को हाथ तक नहीं लगाया। उसे लगने लगा कि शायद गाँव वालों की बात सही थी। शायद बड़े सपने सिर्फ अमीर लोगों के लिए होते हैं।

दीपक की याद

एक रात वह उदास होकर घर के बाहर बैठा था। सामने रखा दीपक तेज हवा में भी जल रहा था।

उसे अचानक साधु की बात याद आई - "सूरज बनने से पहले दीपक की तरह जलना पड़ता है।"

उसने महसूस किया कि एक असफलता उसकी मंजिल नहीं छीन सकती। उस रात उसने फैसला किया कि वह दोबारा प्रयास करेगा।

नया सफर

मोहन अगले दिन शहर चला गया। उसने एक पुस्तकालय में सहायक का काम शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन वहाँ उसे हजारों किताबों तक पहुँच मिल गई। दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। उसने अपने हर खाली मिनट का उपयोग सीखने में किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब वह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए पढ़ रहा था।

बड़ा अवसर

एक वर्ष बाद राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें पूरे प्रदेश के हजारों छात्र भाग लेने वाले थे। मोहन ने भी आवेदन कर दिया। प्रतियोगिता कठिन थी। कई प्रतिभागी बड़े शहरों और प्रतिष्ठित स्कूलों से आए थे।

पहले दिन ही मोहन घबरा गया।

उसे लगा कि वह इन लोगों के सामने टिक नहीं पाएगा।

लेकिन तभी उसने खुद से कहा, "अगर मैं अपनी तुलना दूसरों से करूँगा तो हमेशा कमजोर महसूस करूँगा। मुझे सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।"

यही सोचकर उसने पूरी मेहनत से प्रतियोगिता में भाग लिया।

सफलता का क्षण

कुछ हफ्तों बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र का नाम था - मोहन

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक छोटे गाँव का लड़का इतनी बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। जब यह खबर गाँव पहुँची तो वही लोग, जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। लेकिन मोहन के चेहरे पर घमंड नहीं था। उसे पता था कि यह सफलता सिर्फ एक पड़ाव है।

गाँव के लिए कुछ करने का संकल्प

सफलता मिलने के बाद मोहन ने शहर में ही बसने का निर्णय नहीं लिया। वह अपने गाँव वापस लौटा। उसने देखा कि गाँव के बच्चे आज भी वही कठिनाइयाँ झेल रहे हैं जो उसने झेली थीं। इसलिए उसने गाँव में एक छोटा-सा पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शुरू किया।

शुरुआत में केवल कुछ बच्चे आए। लेकिन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के विद्यार्थी वहाँ पढ़ने आने लगे। मोहन उन्हें सिर्फ किताबें नहीं देता था, बल्कि आत्मविश्वास भी देता था।

जब दीपक सूरज बन गया

कई वर्षों बाद वही गाँव शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

जहाँ पहले लोग बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते थे, अब उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

एक दिन एक छात्र ने मोहन से पूछा, "सर, आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी अंधेरे को कोसा नहीं। मैंने बस अपना दीपक जलाए रखा।"

शिक्षा

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य पर विश्वास रखते हैं और लगातार प्रयास करते रहते हैं, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमती है। असफलता रास्ता रोकने नहीं, बल्कि आपको और मजबूत बनाने के लिए आती है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपना दीपक जलाए रखता है, वही एक दिन सूरज बनकर चमकता है।

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

बुधवार, जून 10

भक्त और भगवान का संबंध

relationship-between-devotee-and-god

एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे। वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 

एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे।

संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले। - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया

भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ, सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडू साथ,

शुक्रवार, जनवरी 12

विश्वास की शक्ति

विश्वास की शक्ति

एक बार नारदजी एक पर्वत से गुजर रहे थे | अचानक उन्होंने देखा कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक तपस्वी तप कर रहा हैं | उनके दिव्य प्रभाव से वह जाग गया और नारदजी को प्रणाम करके पुछा कि उसे प्रभु के दर्शन कब होंगे |

नारदजी ने पहले तो उसे कुछ भी बताने से इनकार किया, फिर बार-बार आग्रह करने पर बताया कि इस वटवृक्ष पर जितनी भी छोटी-बड़ी टहनिया हैं, उतने ही वर्ष उसे और लगेंगे | नारदजी की बात सुनकर तपस्वी बेहद निराश हुआ | उसने सोचा कि इतने वर्ष उसने घर-गृहस्थी में रह कर भक्ति की होती और पुण्य कमाए होते तो उसे ज्यादा फल मिलता | वह बोला - “मैं बेकार ही तप करने आ गया |” नारदजी उसे हैरान परेशान देखकर वहां से चले गए |

आगे जाकर संयोग से वह एक ऐसे जंगल में जा पहुचे जहाँ एक और तपस्वी तप कर रहा था | वह एक प्राचीन और अनंत पत्तो भरे हुए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था | नारदजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और उसने भी प्रभु दर्शन में लगने वाले समय के बारे में पूछा | नारदजी ने उसे भी टालना चाहा, मगर उसने बार-बार अनुरोध किया |

इस पर नारदजी ने कहा - "इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने ही वर्ष अभी और लगेंगे |" हाथ जोड़कर खड़े उस तपस्वी ने जैसे ही ये सुना वह ख़ुशी से झूम उठा और बार-बार यह कहकर नृत्य करने लगा कि प्रभु उसे दर्शन देंगे| उसके रोम-रोम से हर्ष की तरंगे निकल रही थी |

नारदजी मन ही मन में सोच रहे थे कि इन दोनों तपस्वियों में कितना अंतर हैं | एक को अपने ताप पर ही संदेह हैं, वह मोह से अभी तक उभर नही सका और दुसरे को भगवान पर इतना विश्वास हैं कि वह वर्ष-भर प्रतीक्षा के लिए तैयार हैं |

तभी वहा अचानक अलौकिक प्रकाश फ़ैल गया और प्रभु प्रकट होकर बोले – "वत्स ! नारद ने जो कुछ बताया वही सत्य था परन्तु तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास में इतनी गहराई हैं कि मुझे अभी और यही प्रकट होने पड़ा|" 


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