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शुक्रवार, जनवरी 12

विश्वास की शक्ति

विश्वास की शक्ति

एक बार नारदजी एक पर्वत से गुजर रहे थे | अचानक उन्होंने देखा कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक तपस्वी तप कर रहा हैं | उनके दिव्य प्रभाव से वह जाग गया और नारदजी को प्रणाम करके पुछा कि उसे प्रभु के दर्शन कब होंगे |

नारदजी ने पहले तो उसे कुछ भी बताने से इनकार किया, फिर बार-बार आग्रह करने पर बताया कि इस वटवृक्ष पर जितनी भी छोटी-बड़ी टहनिया हैं, उतने ही वर्ष उसे और लगेंगे | नारदजी की बात सुनकर तपस्वी बेहद निराश हुआ | उसने सोचा कि इतने वर्ष उसने घर-गृहस्थी में रह कर भक्ति की होती और पुण्य कमाए होते तो उसे ज्यादा फल मिलता | वह बोला - “मैं बेकार ही तप करने आ गया |” नारदजी उसे हैरान परेशान देखकर वहां से चले गए |

आगे जाकर संयोग से वह एक ऐसे जंगल में जा पहुचे जहाँ एक और तपस्वी तप कर रहा था | वह एक प्राचीन और अनंत पत्तो भरे हुए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था | नारदजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और उसने भी प्रभु दर्शन में लगने वाले समय के बारे में पूछा | नारदजी ने उसे भी टालना चाहा, मगर उसने बार-बार अनुरोध किया |

इस पर नारदजी ने कहा - "इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने ही वर्ष अभी और लगेंगे |" हाथ जोड़कर खड़े उस तपस्वी ने जैसे ही ये सुना वह ख़ुशी से झूम उठा और बार-बार यह कहकर नृत्य करने लगा कि प्रभु उसे दर्शन देंगे| उसके रोम-रोम से हर्ष की तरंगे निकल रही थी |

नारदजी मन ही मन में सोच रहे थे कि इन दोनों तपस्वियों में कितना अंतर हैं | एक को अपने ताप पर ही संदेह हैं, वह मोह से अभी तक उभर नही सका और दुसरे को भगवान पर इतना विश्वास हैं कि वह वर्ष-भर प्रतीक्षा के लिए तैयार हैं |

तभी वहा अचानक अलौकिक प्रकाश फ़ैल गया और प्रभु प्रकट होकर बोले – "वत्स ! नारद ने जो कुछ बताया वही सत्य था परन्तु तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास में इतनी गहराई हैं कि मुझे अभी और यही प्रकट होने पड़ा|" 


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