गुरुवार, अक्टूबर 8

अनमोल पत्थर की प्रेरक कहानी

अनमोल पत्थर की प्रेरक कहानी

एक शाम एक व्यक्ति अकेला बैठा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी और आंखों में निराशा थी। वह काफी देर से अपने जीवन के बारे में सोच रहा था। बार-बार असफलताओं ने उसका आत्मविश्वास तोड़ दिया था। उसे लगने लगा था कि शायद उसमें कोई काबिलियत ही नहीं है और शायद उसका जीवन किसी काम का नहीं।

वह आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन बोला, "आखिर मेरी जिंदगी की कीमत क्या है? मैंने कोशिश तो बहुत की, लेकिन हर बार असफलता ही मिली। शायद मैं किसी काम का नहीं हूं।"

तभी अचानक उसके सामने भगवान प्रकट हुए।

भगवान को अपने सामने देखकर वह व्यक्ति हैरान रह गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए और उसने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मुझे जिंदगी में बहुत असफलताएं मिली हैं। अब मैं पूरी तरह निराश हो चुका हूं। मुझे बताइए, आखिर मेरे इस जीवन की कीमत क्या है?"

भगवान मुस्कुराए। उन्होंने कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। इसके बजाय अपनी मुट्ठी खोली और उसमें से एक लाल रंग का चमकदार पत्थर निकालकर उस व्यक्ति के हाथ में रख दिया।

भगवान ने कहा, "तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें खुद मिलेगा। इस पत्थर की कीमत पता करके मेरे पास वापस आना। लेकिन एक बात याद रखना - इसे किसी भी कीमत पर बेचना मत।"

व्यक्ति को बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने भगवान की आज्ञा मानी और पत्थर लेकर अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।

पहली कीमत - सिर्फ कुछ संतरे

सबसे पहले वह एक फल वाले की दुकान पर पहुंचा। उसने पत्थर अपनी हथेली पर रखा और फल वाले से पूछा, "भाई, तुम इस पत्थर की कितनी कीमत दोगे?"

फल वाले ने पत्थर को देखा, हाथ में लेकर पलटा और फिर बोला, "देखो भाई, मुझे तो इसकी कोई खास कीमत समझ नहीं आ रही। ऐसा करो, तुम मुझसे दस संतरे ले जाओ और बदले में यह पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति कुछ पल चुप रहा। फिर उसे भगवान की बात याद आई - "पत्थर को बेचना नहीं है।"

उसने मुस्कुराकर कहा, "नहीं भाई, मैं इसे बेच नहीं सकता।"

और वह वहां से आगे बढ़ गया।

उसके मन में एक सवाल जरूर आया - "क्या सच में इस पत्थर की कीमत सिर्फ दस संतरे जितनी है?"

दूसरी कीमत - एक बोरी आलू

अब वह एक सब्जी वाले के पास पहुंचा। उसने वही सवाल दोहराया, "भाई, यह पत्थर कितने का खरीदोगे?"

सब्जी वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा, "अगर तुम्हें बेचना ही है तो मैं तुम्हें एक बोरी अच्छे आलू दे सकता हूं। पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति ने फिर सिर हिलाया।

"नहीं, मैं इसे बेच नहीं सकता।"

वह आगे बढ़ गया।

अब उसके मन में उलझन और बढ़ गई थी। एक व्यक्ति के लिए पत्थर दस संतरे के बराबर था और दूसरे के लिए एक बोरी आलू के।

लेकिन उसकी असली कीमत आखिर थी कितनी?

तीसरी जगह बदल गई पूरी कहानी

चलते-चलते वह एक सुनार की दुकान पर पहुंचा। दुकान में सोने और चांदी के आभूषण चमक रहे थे। उसने पत्थर सुनार के सामने रख दिया और पूछा, "क्या आप बता सकते हैं कि यह पत्थर कितने का है?"

सुनार ने पत्थर उठाया और उसे ध्यान से देखने लगा।

पहले उसने उसे एक तरफ से देखा।

फिर दूसरी तरफ से।

फिर रोशनी के सामने रखकर जांचा।

अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए।

उसने व्यक्ति की ओर देखा और कहा, "मैं तुम्हें इसके बदले एक करोड़ रुपये दूंगा। यह पत्थर मुझे दे दो।"

व्यक्ति हैरान रह गया।

"एक करोड़?"

जिस पत्थर के बदले अभी कोई दस संतरे दे रहा था, वही पत्थर अब एक करोड़ रुपये का हो गया था!

लेकिन उसे भगवान की बात याद थी।

उसने विनम्रता से कहा, "माफ कीजिए, मैं यह पत्थर बेच नहीं सकता।"

सुनार ने सोचा शायद वह कम कीमत की वजह से मना कर रहा है।

उसने तुरंत कहा, "ठीक है, मैं तुम्हें दो करोड़ रुपये दूंगा। अब तो दे दो!"

व्यक्ति कुछ पल तक उसे देखता रहा। उसके लिए यह विश्वास करना मुश्किल था कि आखिर इस छोटे से पत्थर में ऐसा क्या है जिसकी कीमत दो करोड़ रुपये लगाई जा रही है।

फिर भी उसने पत्थर अपनी जेब में रखा और वहां से निकल गया।

अब वह पहुंचा उस व्यक्ति के पास, जो पत्थर पहचान सकता था

इसके बाद वह एक प्रसिद्ध हीरा व्यापारी की दुकान पर पहुंचा। दुकान में प्रवेश करते ही उसने व्यापारी को पत्थर दिखाया और पूछा, "क्या आप इस पत्थर की कीमत बता सकते हैं?"

हीरे के व्यापारी ने पत्थर को अपने हाथ में लिया।

वह चुप हो गया।

उसने पत्थर को रोशनी में देखा।

फिर दूसरी तरफ से देखा।

उसने उसे अलग-अलग कोणों से जांचा।

समय बीतता गया।

एक मिनट...

पांच मिनट...

दस मिनट...

व्यक्ति बेचैनी से व्यापारी को देखता रहा। आखिर उसने सोचा कि शायद व्यापारी भी इसकी कीमत नहीं समझ पाया।

लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

व्यापारी ने एक साफ मलमल का कपड़ा लिया, उसे मेज पर बिछाया और उस लाल पत्थर को बहुत सम्मान के साथ उसके ऊपर रख दिया।

फिर वह उसके सामने सिर झुकाकर बैठ गया।

व्यक्ति हैरान रह गया।

व्यापारी ने भावुक होकर कहा, "तुम्हें यह कहां मिला?"

व्यक्ति ने पूछा, "क्यों? क्या हुआ?"

व्यापारी की आंखों में आश्चर्य था।

उसने कहा, "तुम शायद नहीं जानते कि तुम्हारे हाथ में क्या है। यह कोई साधारण पत्थर नहीं है। यह इस दुनिया के सबसे अनमोल रत्नों में से एक है। अगर इस दुनिया की पूरी दौलत भी लगा दी जाए, तब भी इसकी वास्तविक कीमत नहीं चुकाई जा सकती। इसे बेचने की बात तो दूर, इसके सामने कीमत लगाना भी मुश्किल है।"

व्यक्ति कुछ बोल नहीं पाया।

उसके दिमाग में अचानक फल वाला, सब्जी वाला और सुनार घूमने लगे।

दस संतरे... एक बोरी आलू... एक करोड़... दो करोड़... और अब - अनमोल!

उसे पहली बार समझ आया कि पत्थर की कीमत नहीं बदली थी। बदली थी तो सिर्फ उसे पहचानने वालों की नजर। सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी था

वह व्यक्ति बिना देर किए भगवान के पास वापस पहुंचा। उसने पूरी कहानी भगवान को सुनाई और फिर भावुक होकर पूछा, "हे प्रभु, अब मुझे बताइए... आखिर मेरे जीवन की कीमत क्या है?"

भगवान मुस्कुराए और बोले, "मैंने तुम्हें तुम्हारे सवाल का उत्तर देने के लिए ही वह पत्थर दिया था। फल वाले ने अपनी जानकारी के अनुसार उसकी कीमत लगाई। सब्जी वाले ने अपनी समझ के अनुसार उसकी कीमत लगाई। सुनार ने उसकी कीमत पहचानी तो करोड़ों तक पहुंच गया। लेकिन हीरे के व्यापारी ने उस पत्थर को पहचान लिया, इसलिए उसके लिए वह अनमोल हो गया।"

भगवान ने आगे कहा, "हे मनुष्य, तुम्हारे जीवन के साथ भी यही होता है। कुछ लोग तुम्हें बहुत साधारण समझेंगे। कुछ तुम्हारी काबिलियत को छोटी चीजों से तौलेंगे। कुछ लोग तुम्हें कम आंकेंगे और कुछ तुम्हारी सफलता पर भी सवाल उठाएंगे। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि तुम्हारी कोई कीमत नहीं है।"

फिर भगवान ने कहा, "हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई ऐसी विशेषता, प्रतिभा और हुनर छिपा होता है, जिसे हर कोई पहचान नहीं सकता। जैसे उस पत्थर को पहचानने के लिए एक पारखी नजर चाहिए थी, वैसे ही इंसान की असली क्षमता पहचानने के लिए भी सही नजर चाहिए।"

अपनी कीमत दूसरों की नजर से मत तय कीजिए

उस दिन उस व्यक्ति को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक मिला। उसे समझ आया कि वह इसलिए छोटा नहीं हो जाता क्योंकि किसी ने उसे छोटा समझ लिया। किसी के द्वारा की गई आलोचना उसकी वास्तविक क्षमता तय नहीं करती। किसी की अस्वीकृति यह साबित नहीं करती कि उसमें प्रतिभा नहीं है और किसी की उपेक्षा यह नहीं बताती कि उसका जीवन बेकार है।

कई बार हम दूसरों की राय को अपनी सच्चाई मान लेते हैं। कोई कह देता है कि "तुमसे नहीं होगा", तो हम मान लेते हैं कि सच में हमसे नहीं होगा। कोई हमारी मेहनत को नजरअंदाज कर देता है तो हम खुद को असफल समझने लगते हैं। कोई हमारी तुलना किसी और से करता है तो हमें अपनी कमियां ही दिखाई देने लगती हैं।

लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि हर व्यक्ति हमारी कीमत पहचानने की क्षमता नहीं रखता।

आपकी असली कीमत समय बताएगा

अगर आज आपको कोई नहीं पहचान रहा, तो निराश मत होइए। अगर आपकी मेहनत का परिणाम अभी दिखाई नहीं दे रहा, तो प्रयास करना मत छोड़िए। अगर लोग आपकी प्रतिभा को नहीं समझ पा रहे हैं, तो अपनी प्रतिभा को निखारना मत छोड़िए।

एक साधारण पत्थर को भी पहचानने के लिए सही पारखी की जरूरत होती है। उसी तरह आपकी क्षमता को पहचानने के लिए भी सही समय, सही अवसर और सही लोगों की जरूरत हो सकती है।

इसलिए अपनी कीमत उन लोगों से मत पूछिए जो आपको समझ ही नहीं पाए। अपनी कीमत पहचानिए, अपने हुनर को निखारिए और धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहिए।

क्योंकि हो सकता है आज दुनिया आपको केवल एक साधारण पत्थर समझ रही हो...

लेकिन आपके भीतर छिपा हुआ अनमोल रत्न अभी सही पारखी के सामने आया ही न हो।

कहानी की सबसे बड़ी सीख

आपकी कीमत किसी दूसरे व्यक्ति की राय से तय नहीं होती। असफलता यह साबित नहीं करती कि आप बेकार हैं और किसी का आपको कम आंकना आपकी वास्तविक क्षमता को कम नहीं कर देता। हर इंसान के भीतर एक विशेष हुनर छिपा होता है। जरूरत केवल उसे पहचानने, निखारने और सही अवसर मिलने तक धैर्य बनाए रखने की है। इसलिए अगर आज कोई आपकी कीमत नहीं पहचान रहा, तो निराश मत होइए। खुद पर विश्वास रखिए। मेहनत करते रहिए। क्योंकि हो सकता है, आप एक ऐसे अनमोल रत्न हों जिसकी कीमत अभी दुनिया ने पहचानी ही नहीं है।