मंगलवार, सितंबर 29

चार आने का हिसाब

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है। चंदनपुर नाम का एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। वहाँ का राजा वीर, न्यायप्रिय और प्रजा का हित चाहने वाला था। उसके राज्य में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। चारों ओर खुशहाली थी, महल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी और राजकोष भी धन से भरा रहता था।

लेकिन राजा के पास एक ऐसी चीज़ नहीं थी, जिसे वह सबसे अधिक चाहता था - मन की शांति।

रात को सोने के लिए जाते समय उसके मन में न जाने कितने विचार घूमते रहते। कभी वह सोचता, "मेरे पास इतना धन है, फिर भी मन बेचैन क्यों है?"

कभी वह विद्वानों को बुलाता, कभी साधु-संतों से मिलता और कभी दूर-दराज़ से आए ज्ञानी लोगों से अपनी समस्या का समाधान पूछता। लेकिन किसी की बात उसके मन को संतुष्ट नहीं कर पाती।

एक दिन राजा ने सोचा,
"शायद मुझे महल से बाहर निकलकर अपनी प्रजा के बीच जाना चाहिए। हो सकता है, किसी साधारण व्यक्ति के जीवन में मुझे उस शांति का रहस्य मिल जाए, जिसे मैं इतने वर्षों से खोज रहा हूँ।"

अगले ही दिन राजा ने साधारण कपड़े पहने और भेष बदलकर अकेले राज्य की सैर पर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह शहर से दूर एक खेत के पास पहुँचा। वहाँ उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी।

किसान के शरीर पर पुराने और जगह-जगह से फटे कपड़े थे। चेहरे पर मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसके पास न कोई आलीशान घर था, न महल, न धन-दौलत।

लेकिन एक चीज़ देखकर राजा ठिठक गया।

किसान पेड़ की छाँव में बैठकर अपना साधारण-सा भोजन खा रहा था और उसके चेहरे पर अजीब-सी संतुष्टि और खुशी थी।

राजा कुछ देर तक उसे देखता रहा।

उसने मन ही मन सोचा,
"मेरे पास इतना धन है, फिर भी मेरे चेहरे पर वह खुशी नहीं है जो इस गरीब किसान के चेहरे पर दिखाई दे रही है।"

राजा के मन में किसान की मदद करने का विचार आया। उसने अपनी जेब से चार स्वर्ण मुद्राएँ निकालीं और किसान के पास जाकर बोला,

"भाई, मैं एक राहगीर हूँ। मुझे ये चार स्वर्ण मुद्राएँ तुम्हारे खेत में पड़ी मिली हैं। लगता है ये तुम्हारी ही होंगी। तुम इन्हें रख लो।"

किसान ने स्वर्ण मुद्राओं की ओर देखा और मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।

"नहीं सेठ जी, ये मेरी नहीं हैं।"

राजा ने आश्चर्य से पूछा,
"तुम्हें कैसे पता कि ये तुम्हारी नहीं हैं?"

किसान बोला,
"क्योंकि मैंने इन्हें कमाया नहीं है। आप इन्हें अपने पास रखिए या किसी जरूरतमंद को दे दीजिए।"

राजा को यह बात कुछ अजीब लगी।

उसने कहा,
"भाई, धन को कौन ठुकराता है? धन से जीवन आसान होता है। तुम इन्हें रख लो। तुम्हें इनकी ज़रूरत पड़ेगी।"

किसान हँस पड़ा।

"सेठ जी, मुझे जितना चाहिए, उतना मेरे पास है।"

राजा ने हैरानी से पूछा,
"और तुम्हें कितना चाहिए?"

किसान ने बड़े सहज भाव से कहा,

"मैं रोज़ चार आने कमाता हूँ और उन्हीं चार आने में खुशी-खुशी अपना जीवन चला लेता हूँ।"

राजा जैसे चौंक गया।

"सिर्फ चार आने?"

किसान ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

राजा ने पूछा,
"तुम इतने कम पैसों में भी खुश रहते हो?"

किसान ने अपनी थाली एक तरफ रखी और बोला,

"सेठ जी, खुशी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमारे पास कितना पैसा है। असली बात यह है कि हमारे पास जो पैसा है, उसका इस्तेमाल हम किस तरह करते हैं।"

राजा किसान की बात सुनकर सोच में पड़ गया।

उसने पूछा,

"अच्छा! तो तुम इन चार आने का करते क्या हो?"

किसान मुस्कुराया और बोला,

"एक आना कुएँ में डाल देता हूँ, दूसरा आना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ, तीसरा उधार दे देता हूँ और चौथा मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा का माथा घूम गया।

"क्या मतलब?"

लेकिन किसान मुस्कुराता हुआ अपने खेत की ओर चला गया।

राजा पीछे से उसे देखता रह गया।

उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—

"एक आना कुएँ में डालना, एक से कर्ज चुकाना, एक उधार देना और एक मिट्टी में गाड़ देना... आखिर इसका मतलब क्या है?"

उस दिन राजा वापस महल तो लौट आया, लेकिन किसान की बात उसके दिमाग से नहीं निकली।

अगली सुबह उसने तुरंत राजसभा बुलाई।

राजा ने दरबारियों को पूरी घटना सुनाई और पूछा,

"बताओ, उस किसान के चार आने का क्या रहस्य है?"

एक दरबारी बोला,
"महाराज, शायद वह कुएँ में सचमुच पैसा डालता होगा।"

दूसरा बोला,
"शायद वह किसी से लिया हुआ कर्ज चुकाता है।"

तीसरे ने कहा,
"संभव है वह किसी जरूरतमंद को पैसे उधार देता हो।"

चौथे ने कहा,
"और शायद वह सच में पैसे जमीन में गाड़ देता हो।"

राजा ने सबकी बातें सुनीं, लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि नहीं आई।

आखिर उसने आदेश दिया,

"उस किसान को ढूँढकर दरबार में लाया जाए।"

कई लोगों को भेजा गया। बहुत खोजबीन के बाद किसान मिल गया।

अगले दिन वह राजा के दरबार में उपस्थित हुआ।

राजा ने इस बार अपना भेष छोड़ दिया और किसान को बताया,

"जिस व्यक्ति से तुम कल मिले थे, वह कोई साधारण राहगीर नहीं, बल्कि तुम्हारा राजा था।"

किसान घबरा गया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

राजा ने मुस्कुराते हुए कहा,

"घबराओ मत। मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। बल्कि तुम्हारी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है।"

राजा ने किसान को अपने पास बैठाया और पूछा,

"कल तुमने कहा था कि तुम अपनी चार आने की कमाई को चार अलग-अलग जगह लगाते हो। मैं आज उसी रहस्य को जानना चाहता हूँ।"

किसान ने विनम्रता से कहा,

"महाराज, इसमें कोई बड़ा रहस्य नहीं है। बस मैंने अपने जीवन की कमाई को चार हिस्सों में बाँट रखा है।"

राजा ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।

किसान ने कहा,

"पहला आना मैं कुएँ में डाल देता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"इसका क्या अर्थ है?"

किसान बोला,

"महाराज, इसका अर्थ है कि मैं अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने परिवार के भरण-पोषण में लगाता हूँ। जैसे कुएँ में पानी डालने से वह पानी हमारे काम आता है, वैसे ही परिवार पर खर्च किया गया धन हमारे जीवन को संभालता है।"

राजा ने सिर हिलाया।

किसान आगे बोला,

"दूसरा आना मैं अपना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ।"

राजा ने पूछा,
"किसका कर्ज?"

किसान मुस्कुराया।

"अपने माता-पिता का।"

राजा चुप हो गया।

किसान बोला,

"महाराज, मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया और जीवन जीना सिखाया। आज जब वे वृद्ध हो गए हैं तो उनकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। उनकी सेवा करके मैं अपने जीवन का वह कर्ज चुकाता हूँ, जिसे कभी पूरी तरह चुकाया नहीं जा सकता।"

दरबार में सन्नाटा छा गया।

किसान ने तीसरे आने की बात शुरू की।

"तीसरा आना मैं उधार दे देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"किसे?"

किसान ने कहा,

"अपने बच्चों को।"

राजा ध्यान से सुनता रहा।

"मैं अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अच्छे संस्कारों पर यह धन खर्च करता हूँ। आज मैं उन पर खर्च कर रहा हूँ, कल जब वे बड़े होंगे तो यही शिक्षा और संस्कार उनके जीवन में लौटकर आएँगे। इसलिए मैं इसे उधार देना कहता हूँ।"

राजा के चेहरे पर अब समझ की चमक दिखाई देने लगी।

फिर किसान ने कहा,

"और चौथा आना मैं मिट्टी में गाड़ देता हूँ।"

राजा ने पूछा,

"यानी बचत?"

किसान मुस्कुराया।

"जी महाराज। मैं अपनी कमाई का थोड़ा हिस्सा भविष्य के लिए बचाकर रखता हूँ। ताकि जब कभी कठिन समय आए तो मुझे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। और यदि आवश्यकता न पड़े तो उस धन का उपयोग किसी धार्मिक, सामाजिक या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता में कर सकूँ।"

राजा कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत बैठा रहा।

फिर उसने गहरी साँस ली।

उसे अचानक एहसास हुआ कि वह जिस शांति को वर्षों से महल, धन और विद्वानों के बीच खोज रहा था, उसका रास्ता तो इस साधारण किसान को पहले से मालूम था।

राजा ने किसान से कहा,

"आज तुमने मुझे वह बात सिखा दी, जो मेरे सारे विद्वान नहीं सिखा सके।"

किसान ने सिर झुकाकर कहा,

"महाराज, मैंने तो बस अपनी जिंदगी जीने का तरीका बताया है।"

राजा मुस्कुराया।

लेकिन उस दिन से राजा की सोच बदल गई।

अब वह केवल यह नहीं सोचता था कि उसके पास कितना धन है।

वह यह सोचने लगा कि-

"मेरे पास जो धन है, उसका सही उपयोग कितना है?"

उसने अपने जीवन में परिवार, माता-पिता, बच्चों, भविष्य और समाज के लिए धन का उचित हिस्सा निर्धारित करना शुरू किया।

धीरे-धीरे उसके मन की बेचैनी कम होने लगी।

उसे समझ आ गया कि धन अपने आप में खुशी नहीं देता। धन का सही उपयोग ही जीवन में संतोष ला सकता है।