शनिवार, अक्टूबर 24

एक गरीब पिता की पुकार

एक गरीब पिता की पुकार

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में हरिदास नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। उसकी पत्नी का कई साल पहले देहांत हो चुका था। उसका एक ही बेटा था, जिसे उसने मजदूरी करके पढ़ाया-लिखाया था। हरिदास का सपना था कि उसका बेटा बड़ा होकर एक अच्छा इंसान बने और बुढ़ापे में उसका सहारा बने। बेटा पढ़-लिखकर शहर चला गया। शुरुआत में वह हर महीने अपने पिता को पैसे भेजता और फोन करके उनका हाल पूछता था। हरिदास भी गाँव के लोगों से गर्व से कहता, "मेरा बेटा शहर में नौकरी करता है। एक दिन वह मुझे अपने साथ ले जाएगा।"

लेकिन धीरे-धीरे बेटे के फोन कम होने लगे। पैसे आने बंद हो गए और हरिदास की आवाज सुनने के लिए भी उसका बेटा समय नहीं निकालता था। एक दिन हरिदास ने हिम्मत करके बेटे को फोन किया। "बेटा, कई दिनों से तुझसे बात नहीं हुई। तेरी माँ की तस्वीर के सामने बैठता हूँ तो तेरी बहुत याद आती है। अगर समय मिले तो एक बार गाँव आ जा।" बेटे ने जल्दबाजी में जवाब दिया, "पिताजी, अभी बहुत काम है। बाद में बात करता हूँ।" और फोन कट गया।

हरिदास कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा। फिर उसने उसे अपनी पुरानी कमीज की जेब में रखा और आसमान की ओर देखकर बोला, "हे भगवान! मैंने तो अपने बेटे को कभी भूखा नहीं सोने दिया। आज बुढ़ापे में मुझे दो मीठे शब्द भी नसीब नहीं होते। क्या यही मेरे जीवन की कमाई थी?"

उस रात वह बहुत रोया। लेकिन उसे क्या पता था कि अगले दिन उसकी जिंदगी में ऐसी घटना होने वाली थी, जो उसके विश्वास को हमेशा के लिए बदल देगी।

मंदिर की सीढ़ियों पर मिला अनजान व्यक्ति

अगली सुबह हरिदास गाँव के पुराने शिव मंदिर में गया। उसके पास केवल कुछ सिक्के बचे थे। घर में अनाज भी लगभग खत्म हो चुका था। फिर भी उसने मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने सिर झुकाया। "भोलेनाथ, मैं आपसे धन नहीं माँगता। बस इतनी शक्ति देना कि किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।" मंदिर से बाहर निकलते समय उसने देखा कि एक युवक सीढ़ियों के पास बैठा रो रहा था। उसके कपड़े महँगे थे, हाथ में मोबाइल था, लेकिन चेहरे पर गहरी परेशानी थी।

हरिदास उसके पास गया और पूछा, "बेटा, क्या हुआ? इतनी छोटी उम्र में आँखों में इतना दर्द क्यों है?" युवक ने कहा, "बाबा, मेरे पास सब कुछ है। पैसा, गाड़ी, बड़ा घर और अच्छी नौकरी। फिर भी मुझे रात में नींद नहीं आती। मेरे पिता मुझसे नाराज होकर गाँव में अकेले रहते हैं। मैंने उन्हें कई बार फोन करने की सोची, लेकिन हर बार अपने काम में उलझ गया। अब पता नहीं क्यों, मन में डर बैठ गया है कि कहीं बहुत देर न हो जाए।" हरिदास ने उसकी बात सुनी। उसके दिल में अपने बेटे की याद फिर से जाग उठी।

उसने युवक से कहा, "बेटा, दुनिया की सबसे बड़ी दौलत वह इंसान होता है जो तुम्हारे असफल होने पर भी तुम्हारे साथ खड़ा रहे। माता-पिता की नाराजगी से डरना मत, उनके पास लौट जाना। कभी-कभी एक माफी उन वर्षों का दर्द मिटा देती है, जिन्हें हम अपनी व्यस्तता में खो देते हैं।"

युवक ने पूछा, "बाबा, अगर पिता माफ न करें तो?"

हरिदास मुस्कुराया और बोला, "जिस पिता ने तुम्हें चलना सिखाया, वह तुम्हारे लौटने का इंतजार जरूर करेगा। लेकिन याद रखना, इंतजार की भी एक सीमा होती है।" ये शब्द सुनकर युवक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने हरिदास के पैर छुए और वहाँ से चला गया। हरिदास को नहीं पता था कि उस अनजान युवक की जिंदगी में सबकुछ बदल चुका है। उसे तो बस इतना लगा कि शायद भगवान ने आज किसी दुखी इंसान का दर्द थोड़ा कम करने के लिए उसे भेजा था।

वह चिट्ठी जिसने सब कुछ बदल दिया

उस घटना के तीन दिन बाद हरिदास के घर के दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो सामने डाकिया खड़ा था। उसने एक लिफाफा दिया और कहा, "बाबा, आपके नाम चिट्ठी आई है।" हरिदास हैरान था। आजकल उसे चिट्ठी कौन लिखता था? काँपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। उसमें कुछ पैसे और एक पत्र था।

पत्र में लिखा था, "बाबा, आपने मंदिर में जिस युवक को समझाया था, वह मैं ही हूँ। उस दिन आपके शब्द मेरे दिल में उतर गए। मैं उसी शाम अपने पिता के पास पहुँचा। उन्हें देखकर मैं रो पड़ा और उनके गले लगकर माफी माँगी। उन्होंने मुझे माफ कर दिया। बाबा, जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने मुझे इतने सालों तक कभी बद्दुआ क्यों नहीं दी, तो उन्होंने कहा कि "एक पिता अपने बच्चों से नाराज हो सकता है, लेकिन उनके बुरे होने की कामना नहीं कर सकता।" आपने मुझे मेरे पिता से मिलाया। मैं आपका यह उपकार कभी नहीं भूलूँगा। पत्र के साथ कुछ पैसे भेज रहा हूँ। कृपया इन्हें मेरी तरफ से सहायता समझकर स्वीकार कर लें।"

पत्र पढ़ते-पढ़ते हरिदास की आँखें भर आईं। उसने पैसे वापस लिफाफे में रख दिए और मन ही मन कहा, "भोलेनाथ, आपने मेरी प्रार्थना तो सुनी, लेकिन मेरी कल्पना से बिल्कुल अलग तरीके से।" उसने उन पैसों में से कुछ रुपये अपने लिए रखे और बाकी गाँव के उन बच्चों के लिए दे दिए, जिनके पास पढ़ने के लिए किताबें नहीं थीं। उसे लगा कि अगर भगवान ने उसके जीवन में किसी को भेजा है, तो वह मदद केवल अपने तक सीमित क्यों रखे?

लेकिन असली चमत्कार अभी बाकी था

कुछ दिन बाद गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक व्यक्ति उतरा और सीधे हरिदास के घर की ओर बढ़ा। दरवाजे पर पहुँचकर उसने आवाज लगाई, "पिताजी!"

हरिदास बाहर आया। सामने उसका अपना बेटा खड़ा था। कई वर्षों के इंतजार के बाद अपने बेटे को देखकर वह कुछ बोल नहीं पाया। बेटा उसके पैरों में बैठ गया और रोते हुए बोला, "पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं पैसे कमाने में इतना व्यस्त हो गया कि भूल गया कि मेरे पास सबसे कीमती चीज पहले से थी - आपका आशीर्वाद।"

हरिदास ने बेटे के सिर पर हाथ रखा। उसके पास शिकायतों की एक लंबी सूची थी, लेकिन उस क्षण उसके दिल में केवल प्रेम था। उसने कहा, "बेटा, मुझे तुझसे धन नहीं चाहिए था। मैं तो बस चाहता था कि तू कभी-कभी मेरे पास बैठकर मेरी बातें सुन लिया करे।"

बेटे ने पिता को गले लगा लिया और वादा किया कि अब वह उन्हें अकेला महसूस नहीं होने देगा। उस दिन हरिदास की छोटी-सी झोपड़ी में वर्षों बाद फिर से हँसी गूँजी। लेकिन हरिदास के लिए सबसे बड़ा चमत्कार बेटे का लौटना नहीं था। असली चमत्कार यह था कि निराशा से भरे उसके मन में फिर से आशा जाग उठी थी। उसने समझ लिया था कि इंसान की एक छोटी-सी बात भी किसी दूसरे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।

भगवान की लीला और जीवन की सबसे बड़ी सीख

अगली सुबह हरिदास फिर शिव मंदिर गया। उसने भगवान के सामने दीपक जलाया और कहा, "प्रभु, मैं सोचता था कि आप मेरी पुकार नहीं सुनते। लेकिन आज समझ आया कि आपकी कृपा हमेशा उसी रूप में नहीं आती, जिसकी हम कल्पना करते हैं।" जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम भगवान से एक चीज माँगते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ हमें कुछ और सिखाती हैं। हम किसी दरवाजे के खुलने का इंतजार करते रहते हैं, जबकि कभी-कभी वही बंद दरवाजा हमें एक नया रास्ता खोजने की प्रेरणा देता है।

इस कहानी की सीख यह है कि कभी उम्मीद मत छोड़िए, अपने माता-पिता के प्रेम को हल्के में मत लीजिए और किसी दुखी इंसान की मदद करने का अवसर मिले तो पीछे मत हटिए। हो सकता है कि आपके कहे हुए दो अच्छे शब्द किसी की जिंदगी बदल दें। भगवान पर विश्वास रखने का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कठिनाइयाँ नहीं आएँगी। इसका अर्थ है कि कठिनाइयों के बीच भी हम इंसानियत, प्रेम और अच्छे कर्मों का रास्ता नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि कभी-कभी भगवान चमत्कार करने के लिए स्वयं सामने नहीं आते, बल्कि किसी इंसान को किसी दूसरे इंसान की जिंदगी में उम्मीद बनाकर भेज देते हैं।




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