शुक्रवार, अक्टूबर 2

विद्या बड़ी या बुद्धि ?

विद्या बड़ी या बुद्धि ?

बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। उसके चार पुत्र थे। चारों भाई बचपन से ही एक-दूसरे के बहुत करीब थे। साथ खेलते, साथ पढ़ते और हर मुश्किल में एक-दूसरे का साथ देते थे। लेकिन चारों की एक खासियत उन्हें एक-दूसरे से अलग करती थी। पहले तीन भाई शास्त्रों के महान ज्ञाता थे। उन्होंने वर्षों तक कठिन अध्ययन किया था। वे मंत्र, तंत्र और अनेक विद्याओं में पारंगत थे।

लेकिन उनमें एक कमी थी - वे अपनी विद्या पर बहुत घमंड करते थे।

चौथा भाई पढ़ाई में उतना अच्छा नहीं था। उसने शास्त्रों का विशेष अध्ययन नहीं किया था। वह साधारण जीवन जीता था। लेकिन उसमें एक ऐसी खूबी थी जो उसके भाइयों में नहीं थी - वह बहुत बुद्धिमान और समझदार था। वह किसी भी परिस्थिति को ध्यान से देखता, सोचता और फिर निर्णय लेता था।

एक दिन चारों भाइयों ने बैठकर विचार किया। बड़े भाई ने कहा - "हमने इतना अध्ययन किया है। अब समय आ गया है कि अपनी विद्या के बल पर किसी दूसरे राज्य में जाएँ और धन कमाएँ।"

दूसरे भाई ने उत्साह से कहा - "बिल्कुल! राजा और बड़े लोग विद्वानों का सम्मान करते हैं। हमारी विद्या के बदले हमें खूब धन और सम्मान मिलेगा।" 

तीसरा भाई भी उनकी बात से सहमत था। चौथा भाई चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था। कुछ देर बाद चारों भाई यात्रा पर निकल पड़े। लेकिन रास्ते में बड़े भाई ने अचानक कहा - "एक बात सोचने वाली है।" तीसरे भाई ने पूछा - "क्या?"

बड़े भाई ने चौथे भाई की ओर देखते हुए कहा - "हम तीनों ने वर्षों तक शास्त्रों का अध्ययन किया है। लेकिन यह तो कुछ पढ़ा ही नहीं। राजा हमारे ज्ञान का सम्मान करेंगे और हमें धन देंगे। लेकिन इसे देखकर कौन प्रभावित होगा?"

दूसरे भाई ने भी उसकी बात का समर्थन किया। सही कह रहे हो। यह हमारे साथ रहेगा तो हमारी प्रतिष्ठा भी कम होगी। इसे वापस घर चले जाना चाहिए।

चौथे भाई ने सब सुन लिया। उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन तीसरे भाई को अपने भाइयों की बात अच्छी नहीं लगी। उसने कहा - "हम भले ही अलग-अलग विद्या में निपुण हों, लेकिन आखिर हम भाई हैं। हम इसे रास्ते में अकेला कैसे छोड़ सकते हैं? हम जो कमाएँगे, उसमें से कुछ हिस्सा इसे भी दे देंगे।" काफी चर्चा के बाद तय हुआ कि चौथा भाई भी उनके साथ जाएगा। चारों आगे बढ़ते गए।

कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक घने और सुनसान जंगल में पहुँचे। चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। पक्षियों की आवाज़ के अलावा वहाँ कोई दूसरा शोर नहीं था। चलते-चलते अचानक उनकी नजर जमीन पर पड़े कुछ सफेद टुकड़ों पर पड़ी।

वे पास गए तो देखा - वहाँ किसी जानवर की हड्डियों का पूरा ढाँचा पड़ा था। तीनों विद्वान भाइयों की आँखों में अचानक चमक आ गई।

बड़े भाई ने कहा - "भाइयों! हमें अपनी विद्या की परीक्षा लेने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिल सकता।"

दूसरे ने हड्डियों को ध्यान से देखा और बोला - "देखते हैं, हमारी वर्षों की शिक्षा कितनी शक्तिशाली है।"

चौथा भाई कुछ पीछे हट गया। उसने हड्डियों को ध्यान से देखा और पूछा - "लेकिन यह किस जानवर की हड्डियाँ हैं?"

तीनों भाइयों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। बड़े भाई ने अपनी विद्या का प्रयोग शुरू किया।उसने मंत्रों और अपनी कला के बल पर बिखरी हुई हड्डियों को एक जगह इकट्ठा किया। कुछ ही देर में उन हड्डियों से एक पूरा कंकाल तैयार हो गया।

दूसरा भाई आगे बढ़ा - "उसने अपनी विद्या का प्रयोग किया और देखते ही देखते उस कंकाल पर मांस चढ़ने लगा। फिर शरीर पर खाल आ गई। नसों में रक्त का संचार होने लगा।"

अब सामने एक विशाल और भयानक जानवर का शरीर तैयार था। चौथा भाई घबराकर पीछे हट गया। उसने ध्यान से शरीर को देखा और अचानक उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"रुको!"

तीनों भाई उसकी ओर देखने लगे।

चौथा भाई बोला - "तुम जानते भी हो कि तुम किसे जीवित करने जा रहे हो?"

बड़े भाई ने हँसते हुए कहा - "क्यों? अब तुम्हें हमारी विद्या से डर लगने लगा?"

चौथे भाई ने काँपती आवाज़ में कहा - "यह कोई साधारण जानवर नहीं है। ये शेर की हड्डियाँ हैं!"

तीसरा भाई हँस पड़ा।

"तो क्या हुआ?"

चौथा भाई बोला - "अगर तुमने इसे जीवित कर दिया तो यह सबसे पहले हमें ही खा जाएगा!"

तीसरे भाई के चेहरे पर घमंड साफ दिखाई दे रहा था। उसने कहा - "तू हमेशा से डरपोक रहा है। हमने इतनी विद्या वर्षों तक सीखी है और आज तू हमें सिखाएगा कि हमें क्या करना चाहिए?"

चौथा भाई बोला - "मैं तुम्हारी विद्या पर सवाल नहीं उठा रहा। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि हर शक्ति का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता।"

तीसरा भाई बोला - "तुम्हें कुछ नहीं आता, इसलिए तुम हमारी विद्या से डर रहे हो। मैं तो इस शेर को जीवित करके ही रहूँगा।"

चौथे भाई ने देखा कि उसकी बात का कोई असर नहीं हो रहा। उसने कुछ क्षण सोचा। फिर बोला - "ठीक है। अगर तुमने तय ही कर लिया है, तो अपनी विद्या का प्रयोग करो।"

तीनों भाई मुस्कुराए। लेकिन चौथे भाई ने आगे कहा - "बस एक छोटी-सी बात है।"

तीसरे भाई ने पूछा,

"क्या?"

चौथा भाई बोला - "जब तक तुम इसे जीवित करते हो, मैं उस पेड़ पर चढ़ जाता हूँ।" यह कहकर वह तेजी से पास के एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया। तीनों भाइयों ने उसकी ओर देखा और हँसने लगे।

"देखो! डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया!"

लेकिन चौथा भाई चुप रहा। वह ऊपर बैठकर नीचे देखता रहा। तीसरे भाई ने अपनी आँखें बंद कीं।उसने मंत्रों का जाप शुरू किया। जंगल में अचानक अजीब-सी शांति छा गई। हवा जैसे थम गई। कुछ ही क्षण बाद उस मृत शरीर में हलचल होने लगी। पहले उसकी उंगलियाँ हिलीं। फिर उसकी छाती उठने लगी।

फिर अचानक - शेर ने एक जोरदार दहाड़ मारी!

तीनों भाई खुशी से चिल्ला उठे। लेकिन उनकी खुशी अगले ही पल चीख में बदल गई। शेर ने अपनी आँखें खोलीं। उसने सामने खड़े तीनों भाइयों को देखा। उसकी आँखों में भूख थी। तीनों भाइयों को अब अपनी गलती समझ आ चुकी थी। लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। शेर ने एक भयंकर छलांग लगाई। तीनों भाई जान बचाने के लिए भागे, लेकिन शेर उनसे कहीं अधिक तेज था। कुछ ही क्षणों में जंगल में उनकी चीखें गूँजने लगीं।

और फिर...

सब कुछ शांत हो गया। शेर अपने शिकार को खत्म करके जंगल की ओर चला गया। ऊँचे पेड़ पर बैठा चौथा भाई काँपता हुआ यह सब देख रहा था। वह काफी देर तक नीचे उतरने की हिम्मत नहीं कर पाया। जब उसे यकीन हो गया कि शेर बहुत दूर जा चुका है, तब वह धीरे-धीरे पेड़ से नीचे उतरा। उसने अपने तीनों भाइयों को खो दिया था। आँखों में आँसू थे। दिल में गहरा दुख था। वह अकेला अपने घर की ओर लौट पड़ा। रास्ते भर उसके मन में एक ही बात घूमती रही - 

"ज्ञान होना अच्छी बात है, लेकिन उस ज्ञान का सही समय और सही जगह पर इस्तेमाल करना उससे भी अधिक जरूरी है।"

उस दिन उसने अपने भाइयों को खो दिया था, लेकिन उनकी मृत्यु ने उसे जीवन की एक बहुत बड़ी सीख दे दी थी।

कहानी की सीख:


सिर्फ ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है।

ज्ञान तभी उपयोगी है, जब उसके साथ बुद्धि, विवेक और परिस्थिति को समझने की क्षमता भी हो। कभी-कभी इंसान अपनी विद्या, शक्ति, धन या पद पर इतना घमंड करने लगता है कि वह यह भूल जाता है कि हर शक्ति का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता। तीनों भाइयों के पास ज्ञान था, लेकिन उन्होंने बुद्धि की बात नहीं मानी।

चौथे भाई के पास बड़ी-बड़ी विद्याएँ नहीं थीं, लेकिन उसके पास विवेक था, और उसी विवेक ने उसकी जान बचा ली।

इसलिए जीवन में कितना जानते हैं, यह महत्वपूर्ण है।

लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है - "जो जानते हैं, उसका इस्तेमाल कब और कैसे करना है।"