शुक्रवार, अगस्त 1

समझदार दोस्त

समझदार दोस्त

बहुत समय पहले की बात है, दो अरबी दोस्तों को एक बहुत बड़े खजाने का नक्शा मिला, खजाना किसी रेगिस्तान के बीचो-बीच था।

दोनों ने योजना बनाना शुरू की, खजाने तक पहुँचने के लिए बहुत लम्बा समय लगता और रास्ते में भूख- प्यास से मर जाने का भी खतरा था। बहुत विचार करने पर दोनों ने तय किया कि इस योजना में एक और समझदार दोस्त को शामिल किया जाए, ताकि वे एक और ऊंट अपने साथ ले जा सकें जिस पर खाने-पीने का ढ़ेर सारा सामान भी आ जाए और खजाना अधिक होने पर वे उसे ऊंट पर ढो भी सकें।

पर सवाल ये उठा कि चुनाव किसका किया जाए?

बहुत सोचने के बाद गुरु और बबलू को चुना गया। दोनों हर तरह से बिलकुल एक तरह के थे और कहना मुश्किल था कि दोनों में अधिक बुद्धिमान कौन है? इसलिए एक प्रतियोगिता के जरिये सही व्यक्ति का चुनाव करने का फैसला किया गया।

दोनों दोस्तों ने उन्हें एक निश्चित स्थान पर बुलाया और बोले, “आप लोगों को अपने-अपने ऊंट पर सवार होकर सामने दिख रहे रास्ते पर आगे बढ़़ना है। कुछ दूर जाने के बाद ये रास्ता दो अलग-अलग रास्तों में बंट जाएगा- एक सही और एक गलत। जो इंसान सही रास्ते पर जाएगा वही हमारा तीसरा साथी बनेगा और खजाने का एक-तिहाई हिस्सा उसका होगा।”

दोनों ने आगे बढ़ना शुरू किया और उस बिंदु पर पहुँच गए जहाँ से रास्ता बंटा हुआ था।

वहां पहुँच कर गुरु ने इधर-उधर देखा, उसे दोनों रास्तों में कोई अंतर समझ नहीं आया और वह जल्दी से बांये तरफ बढ़़ गया। जबकि, बबलू बहुत देर तक उन रास्तों की ओर देखता रहा, और उन पर आगे बढ़ने के नतीजे के बारे में सोचता रहा।

करीब 1 घंटे बाद बायीं ओर के रास्ते पर धूल उड़ती दिखाई दी। गुरु बड़ी तेजी से उस रास्ते पर वापस आ रहा था।

उसे देखते ही बबलू मुस्कुराया और बोला, “गलत रास्ता ?”

“हाँ, शायद!”, गुरु ने जवाब दिया।

दोनों दोस्त छुप कर यह सब देख रहे थे और वे तुरंत उनके सामने आये और बोले, “बधाई हो!”

“शुक्रिया!”, बबलू ने फ़ौरन जवाब दिया।

“तुम्हे नहीं, हमने गुरु को चुना है।”, दोनों दोस्त एक साथ बोले।

“पर गुरु तो गलत रास्ते पर आगे बढ़ा था… फिर उसे क्यों चुना जा रहा है?”, बबलू गुस्से में बोला।

“क्योंकि उसने ये पता लगा लिया कि गलत रास्ता कौन है और अब वो सही रास्ते पर आगे जा सकता है, जबकि तुमने पूरा वक़्त बस एक जगह बैठ कर यही सोचने में गँवा दिया कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत। समझदारी किसी चीज के बारे में ज़रूरत से ज्यादा सोचने में नहीं बल्कि एक समय के बाद उस पर काम करने और तजुर्बे से सीख लेने में है।”, दोस्तों ने अपनी बात पूरी की, और खजाने की तरफ चल दिये, बबलू बैठा बैठा वहीं पछताता रहा..!!

शिक्षा:- हमारे जीवन में भी कभी न कभी ऐसा स्थान (समय) आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत और ऐसे में बहुत से लोग बस सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं, जबकि ज़रुरत इस बात की है कि चीजों को विश्लेषण करने की बजाय गुरुजी की तरह अपने विकल्प को समझ करके निर्णय लिया जाए और अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ा जाए।

मंगलवार, जून 11

आनंदित रहने की कला


एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए। राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्याएँ बताते हुए कहा कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है। राजा का बेटा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है। जब भी उसे कोई पात्र इंसान मिलेगा, जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों, तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा।

गुरु ने कहा - "राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई इंसान मिल सकता है?" राजा ने कहा - "मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागड़ोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ।"
गुरु ने पूछा - "अब तुम क्या करोगे?"  राजा बोला - "मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए।" गुरु ने कहा - "मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा।"

राजा बोला - "फिर ठीक है, "मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा।" गुरु ने कहा - "अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है। क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे?"

राजा बोला - "कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ।" गुरु ने कहा - "मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना।"

एक वर्ष बाद गुरु ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था। अब तो दोनों ही काम हो रहे थे। जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था। अब उसे कोई चिंता नहीं थी।

इस कहानी से समझ में आएगा की वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ? कुछ भी तो नहीं! राज्य वही, राजा वही, काम वही, सिर्फ दृष्टिकोण बदल गया ।

इसी तरह हम भी जीवन में अपना दृष्टिकोण बदलें। मालिक बनकर नहीं, बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें की, "मैं ईश्वर कि नौकरी कर रहा हूँ" अब ईश्वर ही जाने। सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें। फिर ही आप हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे।

सोमवार, जून 10

बुद्धिमान हंस


एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बहुत सारे हंस रहते थे। उनमें एक बहुत बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी हंस था। सब उसका आदर करते और सभी उसको ताऊ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? 

बुद्धिमान हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? 

तीसरा हंस बोला - ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी भी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी? समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। 

एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया। शाम को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो। दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो  आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे |

सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना। सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया।

भावार्थ - वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं। वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है, बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई बोझ नहीं हैं।

मंगलवार, अप्रैल 25

संघर्ष का महत्व

एक बार एक किसान परमात्मा से बहुत नाराज़ हो गया। हर साल उसकी फ़सल किसी न किसी कारण से खराब हो जाती थी। कभी बाढ़ आती, कभी सूखा पड़ता, कभी तेज धूप तो कभी ओलों से खेत बर्बाद हो जाते।

किसान दुखी होकर बोला –
"हे प्रभु, आप परमात्मा हैं लेकिन खेती-बाड़ी की आपको शायद ज्यादा जानकारी नहीं है। हर बार मेरी फ़सल खराब हो जाती है। कृपा करके मुझे एक साल का मौका दीजिए। उस साल मौसम मेरी इच्छा के अनुसार होगा। तब आप देखना मैं कैसे अन्न के भंडार भर देता हूँ।"

परमात्मा मुस्कुराए और बोले -
"ठीक है, जैसा तुम चाहोगे वैसा ही मौसम होगा। इस साल मैं कोई दखल नहीं दूँगा।"

किसान के अनुसार मौसम

अब किसान ने गेहूं की फ़सल बोई। जब उसे धूप चाहिए थी, धूप मिल गई। जब पानी चाहिए था, बारिश हो गई। उसने तेज आंधी, बाढ़, ओले और तूफ़ान को आने ही नहीं दिया।

दिन बीतते गए और फसल खूब लहलहाने लगी। किसान खुशी से झूम उठा। उसे लगा -
"अब परमात्मा को समझ आएगा कि खेती कैसे की जाती है। कितने साल से बेकार में हमें परेशान करते आ रहे हैं। इस साल अनाज की भरपूर पैदावार होगी।"

कटाई का समय और किसान का सदमा

समय बीता और फसल कटने का मौसम आ गया। किसान बड़े गर्व और उत्साह के साथ खेत में पहुँचा। सुनहरी बालियाँ देखकर उसका मन प्रसन्न हो उठा।

लेकिन जैसे ही उसने फसल काटनी शुरू की, वह चौंक गया। हर एक बाली अंदर से खाली थी। गेहूं का एक भी दाना नहीं था। पूरी फ़सल खोखली निकली।

किसान छाती पकड़कर बैठ गया और दुखी होकर बोला -
"हे प्रभु, ये क्या हुआ? मैंने तो धूप, पानी और सब कुछ सही समय पर दिया था। फिर भी फ़सल खाली क्यों रह गई?"

परमात्मा का उत्तर

परमात्मा ने बड़ी शांति से कहा -
"ये तो होना ही था। तुमने अपने पौधों को संघर्ष करने का एक भी मौका नहीं दिया। ना तेज धूप में उन्हें तपने दिया, ना आंधी-पानी से जूझने दिया। जब पौधे कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, तभी वे मजबूत बनते हैं और अनाज पैदा करते हैं।"

"संघर्ष ही शक्ति देता है, ऊर्जा देता है, जीवन में गहराई और मजबूती लाता है। सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपना और हथौड़े से पिटना पड़ता है। ठीक वैसे ही इंसान और पौधे भी चुनौतियों से गुजरकर ही अनमोल बनते हैं।"

शिक्षा:- इसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता। ये चुनौतियां ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनौतियां तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे। अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा।



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गुरुवार, मार्च 23

सच्ची जीत

एक गांव में एक किसान रहता था। उसका नाम शेर सिंह था । शेर सिंह जैसा भंयकर और अभिमानी उस गाँव में कोई न था । वह बात-बात पर बिगड़ जाता और लड़ाई कर लेता था। वह गांव के लोगों से सीधे मुंह बात तक नहीं करता था। न तो वह कभी किसी के घर जाता और न ही रास्ते में मिलने पर किसी को प्रणाम करता था। गांव का कोई भी व्यक्ति उसके इसी अहंकार के कारण उससे बात करने में भी इच्छुक नही था |  

कुछ समय बाद, उसी गांव में एक दयाराम नाम का एक किसान आकर रहने लगा। वह बहुत सीधा और भला आदमी था। सबसे विनम्रता से बोलता था। सबकी कुछ न कुछ सहायता किया करता था। सभी किसान उसका आदर करते और अपने कामों में उससे सलाह लिया करते थे। 

गांव के किसान ने दयाराम से कहा, “भाई दयाराम! तुम कभी शेर सिंह के घर मत जाना। उससे दूर ही रहना। वह बहुत झगड़ालू व्यक्ति है।” 

दयाराम ने हंसकर कहा, “शेर सिंह ने मुझसे झगड़ा किया तो, मैं उसे मार ही डालूंगा।” 

दूसरे किसान भी हंस पड़े। वे जानते थे कि दयाराम बहुत दयालु है। वह किसी को मारना तो दूर, किसी को गाली तक नहीं दे सकता। लेकिन यह बात किसी ने शेर सिंह से कह दी। शेर सिंह क्रोध से लाल हो गया। वह उसी दिन से दयाराम से झगड़ने की चेष्टा करने लगा। उसने दयाराम के खेत में अपने बैल छोड़ दिए। बैल बहुत-सा खेत चर गए, किंतु दयाराम ने उन्हें चुपचाप खेत से हांक दिया। 

शेर सिंह ने दयाराम के खेत में जाने वाली पानी की नाली तोड़ दी। पानी बहने लगा। दयाराम ने आकर चुपचाप नाली बांध दी। इसी प्रकार शेर सिंह बराबर दयाराम की हानि करता रहा, परंतु दयाराम ने एक बार भी उसे झगड़ने का अवसर नहीं दिया। 

एक दिन दयाराम के यहां उनके संबंधी ने लखनऊ के मीठे खरबूजे भेजे, दयाराम ने सभी किसानों के घर एक-एक खरबूजा भेज दिया, लेकिन शेर सिंह ने उसका खरबूजा यह कह कर लौटा दिया कि “मैं भिखारी नहीं हूं। मैं दूसरों का दान नहीं लेता।” 

बरसात आई। शेर सिंह एक गाड़ी अनाज भर कर दूसरे गांव से आ रहा था। रास्ते में एक नाले में कीचड़ में उसकी गाड़ी फंस गई। शेर सिंह के बैल दुबले थे। वे गाड़ी को कीचड़ में से निकाल नहीं सके। जब गांव में इस बात की खबर पहुंची तो सब लोग बोले, “शेर सिंह बड़ा दुष्ट है। उसे रात भर नाले में पड़े रहने दो।” 

लेकिन दयाराम ने अपने बलवान बैल पकड़े और नाले की ओर चल पड़ा। लोगों ने उसे रोका और कहा, “दयाराम! शेर सिंह ने तुम्हारी बहुत हानि की है। तुम तो कहते थे कि मुझसे लड़ेगा तो उसे मार ही डालूंगा। फिर तुम आज उसकी सहायता करने क्यों जाते हो?” 

दयाराम बोला, “मैं आज सचमुच उसे मार डालूंगा। तुम लोग सवेरे उसे देखना।” 

जब शेर सिंह ने दयाराम को बैल लेकर आते देखा तो गर्व से बोला, “तुम अपने बैल लेकर लौट जाओ। मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिए।” 

दयाराम ने कहा, “तुम्हारे मन में आवे तो गाली दो, मन में आवे मुझे मारो, इस समय तुम संकट में हो। तुम्हारी गाड़ी फंसी है और रात होने वाली है। मैं तुम्हारी बात इस समय नहीं मान सकता।”

दयाराम ने शेर सिंह के बैलों को खोलकर अपने बैल गाड़ी में जोत दिए। उसके बलवान बैलों ने गाड़ी को खींचकर नाले से बाहर कर दिया। शेर सिंह गाड़ी लेकर घर आ गया। उसका दुष्ट स्वभाव उसी दिन से बदल गया। वह कहता था, “दयाराम ने अपने उपकार के द्वारा मुझे मार ही दिया। अब मैं वह अहंकारी शेर सिंह नहीं रहा।” 

अब वह सबसे नम्रता और प्रेम का व्यवहार करने लगा। बुराई को भलाई से जीतना ही सच्ची जीत है। और इस प्रकार दयाराम ने सच्ची जीत पाई।